थक गया हूँ राहों पर चलते-चलते,
टूटे सपनों को जोड़ते-जोड़ते।
थक गया हूँ दिल के जख्म छुपाते-छुपाते,
ख़ामोशियों में अपने से बहस करते करते ।
थक गया हूँ उम्मीदों को सँवारते-सँवारते,
टूटी साँसों को फिर उठाते-उठाते।
थक गया हूँ रिश्तों को निभाते-निभाते,
खुद को ही हर रोज़ मनाते मनाते।
थक गया हूँ खुद से सवाल करते-करते,
किस्मत की दीवारों में टकराते-टकराते।
थक गया हूँ दर्द को दबाते-दबाते,
मुस्कानों के नक़ाब में छुपाते छुपाते।
थक गया हूँ नफ़रतों से दिल बचाते-बचाते,
अपनों की आँखों में सच ढूँढ़ते ढूँढते।
थक गया हूँ तन्हाई को साथी बनाते-बनाते,
सपनों को फिर से जगाते-जगाते।
थक गया हूँ फ़ैसलों को अकेले उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के बोझ को समझते-समझते।
थक गया हूँ हालातों को आज़माते-आज़माते,
वक़्त की धारा में खुद को ढालते ढालते।
थक गया हूँ जंग को किस्मत से लड़ाते-लड़ाते,
हर बार नई उम्मीदें उगाते-उगाते।
थक गया हूँ गिरकर भी खुद उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के सबक हर रोज़ निभाते-निभाते।
महेंद्र ‘मजबूर’©️®️
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