बुधवार, 3 दिसंबर 2025

तन्हाई के नक्शे

 ग़मों की चौखट पर रौशनियाँ आती तो हैं मगर,

दिल की दीवारों में पुरानी दरारें हँसने नहीं देतीं।
हर खुशी दहलीज़ पर रुककर लौट जाती है,
मानो मेरी तन्हाई की इजाज़त बिना वो भीतर नहीं देतीं।

अब तो हाल ये है कि मोहब्बत भी डरकर आती है,
मेरी आँखों की ख़ामोशी को इल्ज़ाम दे जाती है।
कभी चाहतों का शहर था ये दिल,
आज वीरानी ही यहाँ के नक़्शे दिखाती है।

यादें भी अब सरक कर चुपचाप बैठ जाती हैं,
उनकी मुस्कानें भी अब मुझे छू नहीं पातीं।
हर मीठा लम्हा, हर पुरानी बातें,
सिर्फ़ खामोशी में गूँजती हैं।

सपनों के दीये अब बुझते हुए लगते हैं,
हर उम्मीद की लौ थककर हिचकिचाती है।
कुछ पाने की चाह अब डर में बदल गई है,
और दिल सिर्फ़ इंतज़ार की गली में खो गया है।

वक्त की ठंडी हवाएँ
मेरे अरमानों के फूलों को झुका देती हैं।
कभी जो रंगीन थे मेरे ख़्वाब,
अब सिर्फ़ धूल में मिलते हैं।

कभी हँसी की आवाज़ें
मेरे कमरे की दीवारों में गूँजती थीं,
आज सिर्फ़ खामोशी की टहलनियाँ
मेरे कदमों की आवाज़ें सुनती हैं।

मोहब्बत की परछाई भी
अब मेरे दरवाज़े पर झिझकती है।
दिल के वीराने में
कभी कोई फूल न उग पाया।

कुछ लम्हों की गर्माहट
अभी भी छुपकर आती है,
लेकिन मेरी आँखें अब
सिर्फ़ टूटे हुए ख्वाबों को पहचानती हैं।

दुनिया की रौशनीें चमकती हैं,
मगर मेरी तन्हाई उन्हें देख नहीं पाती।
हर खुशी की गूँज
मेरे भीतर की खाई में खो जाती है।

फिर भी दिल की कोई उम्मीद
चुपचाप जलती रहती है।
शायद एक दिन
इस वीराने में भी फिर हँसी आ जाएगी।

महेंद्र ‘मजबूर’©️®️

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

थक गया हूँ

 थक गया हूँ राहों पर चलते-चलते,

टूटे सपनों को जोड़ते-जोड़ते।

थक गया हूँ दिल के जख्म छुपाते-छुपाते,
ख़ामोशियों में अपने से बहस करते करते ।

थक गया हूँ उम्मीदों को सँवारते-सँवारते,
टूटी साँसों को फिर उठाते-उठाते।

थक गया हूँ रिश्तों को निभाते-निभाते,
खुद को ही हर रोज़ मनाते मनाते।

थक गया हूँ खुद से सवाल करते-करते,
किस्मत की दीवारों में टकराते-टकराते।

थक गया हूँ दर्द को दबाते-दबाते,
मुस्कानों के नक़ाब में छुपाते छुपाते।

थक गया हूँ नफ़रतों से दिल बचाते-बचाते,
अपनों की आँखों में सच ढूँढ़ते ढूँढते।

थक गया हूँ तन्हाई को साथी बनाते-बनाते,
सपनों को फिर से जगाते-जगाते।

थक गया हूँ फ़ैसलों को अकेले उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के बोझ को समझते-समझते।

थक गया हूँ हालातों को आज़माते-आज़माते,
वक़्त की धारा में खुद को ढालते ढालते।

थक गया हूँ जंग को किस्मत से लड़ाते-लड़ाते,
हर बार नई उम्मीदें उगाते-उगाते।

थक गया हूँ गिरकर भी खुद उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के सबक हर रोज़ निभाते-निभाते।

महेंद्र ‘मजबूर’©️®️

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

रात ओढ़े फूलों-सी


रात ओढ़े फूलों-सी, हल्की-हल्की बयार,
हवा में घुलती यादों का बजता है झंकार।।

छूकर गुज़रे ख़्वाबों में, तेरी वो चांदनी,
मन कहे बस पास आ, दूरी अब ना रही।
दिल की धड़कन बोले, तुझपे ही है ऐतबार,
सांसों में बसी तू है, तू ही मेरा प्यार।।

तेरी हँसी में चमकी हैं तारों की कतार,
दिल के इस सागर में तू ही है पतवार।
सपनों की राहों पर संग चलें हम दोनों,
चाहत के इस मौसम में खिल उठे बहार।।

झील-सी तेरी आँखें, मोती-सा तेरा नूर,
बातें तेरी लगती हैं, जैसे मीठा सुरूर।
महकी-महकी चाहत, बिखरे चारों ओर,
तू मिले तो मिल जाता, दुनिया भर का शोर।।

रात भी कहने लगी, अब तो आ जा करीब,
मुझमें ही खो जाएगा, तेरी यादों का सलीब।
चाँद की बारातें हों, हम दोनों के नाम,
पल-पल तेरी धुन गाए, दिल का यह मयूर।।

तेरी बाहों में सिमटकर, हर लम्हा जीना चाहूँ,
तेरे चेहरे की रोशनी में अपना जहां बसाऊँ।
तेरी धड़कन से मिले जो, वही मेरा सुकून,
तेरे प्यार में खोकर मैं बन जाऊँ तेरे जुनून।।

रात ओढ़े फूलों-सी, हल्की-हल्की बयार,
हवा में घुलती यादों का बजता है झंकार।।

महेंद्र मजबूर ©️®️

विरासत अब बेटी की

 

विरासत अब बेटी की

हालातों की धूल में दबी थी दिल की मजबूरी,
सदियों से सुनते आए थे— विरासत बेटे से पूरी।
पर एक दिन आँसूओं ने सवाल ये पूछ लिया,
क्या नाम के बिना भी कोई रिश्ता अधूरा रहा?
बेटियाँ आशाओं की ज्योत, सपनों की रखवाली,
वे ही संभालती हैं घर-आँगन की हर दीवारी।
कंधों पर जिम्मेदारियों की अनगिनत परतें,
फिर भी दुनिया बेटों को ही बताती रही, ज़रूरतें।
बाप के सीने से लग रो पड़ीं वो मासूम बाँहें,
कह गईं— हम भी तो तेरी साँसों की ही चाहें!
वक़्त ने भी सोचा— अब ये फैसले बदलेंगे,
विरासत के मायने कल की पीढ़ी गढ़ेंगे।
नाम से नहीं, कर्मों से पहचानें बनती हैं,
घर की नींवों में बेटियाँ भी शामिल रहती हैं।
अब कौन रोकेगा? दीवारें ढहने लगी हैं,
विरासत की कुंजी बेटियाँ गढ़ने लगी हैं।

- महेंद्र 'मजबूर'©️®️

रविवार, 30 नवंबर 2025

तुम्हारा प्रेम

 कितना छोटा-सा प्रेम था तुम्हारा,

मानो किसी मौसम की घड़ी—
आया, ठहरा,
और कुछ ही पलों में लौट गया।

पर मेरा प्रेम…
वह किसी नदी की तरह है—
धीमी, लगातार बहती हुई,
चट्टानों से टकराकर भी
अपना स्वर नहीं खोती।

तुम्हारा स्नेह तो
थोड़ी-सी धूप जैसा था—
जिसे बादलों ने छुपा लिया।
मेरा प्रेम उस मिट्टी जैसा है
जो धूप-छाँव हर बार सहकर भी
अपनी खुशबू नहीं छोड़ती।

मैंने तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा—
शब्द खुद तुम्हारी ओर खिंचते चले आए।
अब ये पन्ने
मेरे जिये हुए दिनों की तरह
तुम्हारी छाया सँभाले बैठे हैं।

तुम रहो या न रहो,
मेरे भीतर एक धीमी-सी लौ जलती रहेगी,
जो प्रेम को कम नहीं होने देगी—
जो मेरे बाद भी कहेगी,
उसी शांत-सी करुण मुस्कान के साथ—

तुम हो… ना हो…
मेरा प्रेम तो रहेगा ही।

महेंद्र मजबूर 


जाता हुआ नवम्बर

 जाता हुआ नवम्बर

जैसे कोई आख़िरी चिट्ठी बिना पढ़े रखी रह जाए,
और हम सोचते रहें—
इसमें क्या लिखा होगा?

मौसम बदलता है
तो पता चलता है
कि सिर्फ़ हवा ठंडी नहीं होती,
कुछ रिश्ते भी ठंडे पड़ने लगते हैं।

साल बदल रहा है—
कैलेंडर में नहीं,
हमारी आदतों में,
हमारी चुपियों में,
उन सवालों में जिनके जवाब
कभी मिल ही नहीं पाते।

लोग बदलते हैं,
और हम सोचते रहते हैं
कि शायद अगली बार वे वहीं मिलेंगे
जहाँ हमने छोड़ा था—
पर कोई भी वहीं नहीं मिलता।

वक़्त बदलता है
तो हम समझते हैं
कि कहानियाँ बस लिखी नहीं जातीं,
वे मिटती भी रहती हैं
जैसे किसी पुराने फोटो में
चेहरे धीरे-धीरे धुँधले हो जाते हैं।

ज़िंदगी…
वह चलती तो है,
पर हर मोड़ पर थोड़ी टूटती भी है।
किसी से प्यार करते-करते
हम खुद को खो भी देते हैं,
और पाते भी हैं।

जाता हुआ नवम्बर
सिर्फ़ मौसम नहीं,
वह एक नोट है—
जो कहता है:
चलो आगे,
जहाँ जो भी बदलेगा
वही सच होगा।

महेंद्र 'मजबूर'©️®️

शनिवार, 29 नवंबर 2025

बेवफाई

 मेरी आँखों से गिरा आँसू—सवाल-ए-बेवफ़ाई है,

तेरी पलकों से जो टपका वो गवाह-ए-बेवफ़ाई है।

तू गया तो सच कहूँ दिल पर अभी तक है चुभन बाकी,
तेरी यादों का समुन्दर आज राह-ए-बेवफ़ाई है।

तेरे वादों पर यक़ीं था, इश्क़ में हसरतें भी थीं,
वक़्त के हाथों ये सब कुछ बस दास्तान-ए-बेवफ़ाई है।

मेरा रंजिश में भी तेरे नाम का ही ज़िक्र रहता है,
हर एहसास-ए-वफ़ा अब बस फ़साना-ए-बेवफ़ाई है।

तू लौटे भी तो दिल पर फिर वही पड़ जाएगी दरार,
जो टूटा है वो टूटा है—नसीहत-ए-बेवफ़ाई है।

-महेंद्र ‘मजबूर’