ग़मों की चौखट पर रौशनियाँ आती तो हैं मगर,
दिल की दीवारों में पुरानी दरारें हँसने नहीं देतीं।
हर खुशी दहलीज़ पर रुककर लौट जाती है,
मानो मेरी तन्हाई की इजाज़त बिना वो भीतर नहीं देतीं।
अब तो हाल ये है कि मोहब्बत भी डरकर आती है,
मेरी आँखों की ख़ामोशी को इल्ज़ाम दे जाती है।
कभी चाहतों का शहर था ये दिल,
आज वीरानी ही यहाँ के नक़्शे दिखाती है।
यादें भी अब सरक कर चुपचाप बैठ जाती हैं,
उनकी मुस्कानें भी अब मुझे छू नहीं पातीं।
हर मीठा लम्हा, हर पुरानी बातें,
सिर्फ़ खामोशी में गूँजती हैं।
सपनों के दीये अब बुझते हुए लगते हैं,
हर उम्मीद की लौ थककर हिचकिचाती है।
कुछ पाने की चाह अब डर में बदल गई है,
और दिल सिर्फ़ इंतज़ार की गली में खो गया है।
वक्त की ठंडी हवाएँ
मेरे अरमानों के फूलों को झुका देती हैं।
कभी जो रंगीन थे मेरे ख़्वाब,
अब सिर्फ़ धूल में मिलते हैं।
कभी हँसी की आवाज़ें
मेरे कमरे की दीवारों में गूँजती थीं,
आज सिर्फ़ खामोशी की टहलनियाँ
मेरे कदमों की आवाज़ें सुनती हैं।
मोहब्बत की परछाई भी
अब मेरे दरवाज़े पर झिझकती है।
दिल के वीराने में
कभी कोई फूल न उग पाया।
कुछ लम्हों की गर्माहट
अभी भी छुपकर आती है,
लेकिन मेरी आँखें अब
सिर्फ़ टूटे हुए ख्वाबों को पहचानती हैं।
दुनिया की रौशनीें चमकती हैं,
मगर मेरी तन्हाई उन्हें देख नहीं पाती।
हर खुशी की गूँज
मेरे भीतर की खाई में खो जाती है।
फिर भी दिल की कोई उम्मीद
चुपचाप जलती रहती है।
शायद एक दिन
इस वीराने में भी फिर हँसी आ जाएगी।
महेंद्र ‘मजबूर’©️®️
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