जीवन
रेत
सा
तुम
मरिचिका
भटकन
दिल
तलाश
प्यास
प्रेम
दूर
धूप
जलन
रेत
अंतहीन
कदम
थके
सांस
रुकी
फिर
खुशबू
हवा
छुई
तुम
उतरी
पलकों
पर
सच
बनी
कंठ
तर
दिल
भरा
धूप
दुलार
रेगिस्तान
मुस्कुराया
ओस
गिरी
नाम
तेरा
जीवन
मिला।
रेत
सा
तुम
मरिचिका
भटकन
दिल
तलाश
प्यास
प्रेम
दूर
धूप
जलन
रेत
अंतहीन
कदम
थके
सांस
रुकी
फिर
खुशबू
हवा
छुई
तुम
उतरी
पलकों
पर
सच
बनी
कंठ
तर
दिल
भरा
धूप
दुलार
रेगिस्तान
मुस्कुराया
ओस
गिरी
नाम
तेरा
जीवन
मिला।
जीवन
रेत
तुम
मरीचिका
दिल
भटका
प्यास
जगी
धूप
चुभी
रेत
झरी
कदम
थके
सांस
रुकी
हवा
बही
खुशबू
आई
तुम
उतरी
नज़र
भीगी
कंठ
तरा
धूप
मुलायम
रेत
गुनगुनी
दिल
हँसा
ओस
गिरी
नाम
तेरा
जीवन
खिला।
महेंद्र 'मजबूर'
छम छम पायल,
बजे रे गोरी,
घाट किनारे
खड़ी ठठोली।
नील गगन में
उड़े अँचरा,
धूप पिए
जल में सवेरा।
नैन कटारी,
हँसी चकोरी,
बोले कुछ ना,
कहे सब गोरी।
हाथ कंगना,
चूड़ी छनके,
घट उठावे
मृदु तन थरके।
झर-झर नदिया,
गीत सुनावे,
प्रीत पुरानी
फिर बहकावे।
कछु ना बोले,
मन मुस्कावे,
पनघट वाला
नयन मिलावे।
साँझ ढले रे,
गोरी आई,
धूप झरे,
छाँव समाई।
घट में पानी,
नयन में सपना,
पग में थिरकन,
मन में अपना।
चाँद झुके रे,
नीर चमकाए,
गोरी झुके तो
बिंदिया जगमगाए।
डरती बोले,
धीरे-धीरे,
“मत देखो यूँ,
नयन पगीरे।”
पवन बहे तो,
चूनर डोले,
बन के बिजली,
तन पे बोले।
घर की देहरी,
नज़दीक आई,
पीछे मुड़ के
मुस्कुराई।
मन कहे धीरे —
फिर पनघट पे,
कल ही आऊँ,
ओ रे सजन।
भोर भये रे,
गोरी आई,
नींद नयन की
ओस बन पाई।
घट उठावे,
गुनगुन गावे,
मन में छुपा
गीत सुनावे।
झर-झर नदिया,
संग बहाए,
चुनरी छूके
हवा लजाए।
साजन आया,
धीरे बोला,
“गोरी रुक जा,
दिल मत तोला।”
गोरी हँसी,
नैन झुकाए,
गागर हिलते
प्रीत छलकाए।
रेत पे लिखे,
दो नाम सजन,
लहर ने ढाके,
फिर दे चुम्बन।
भोर सजीली,
धूप सुहानी,
पनघट बन गया —
प्रेम कहानी।
बरस बीते,
धूप बदल गई,
गोरी की चूनर
रंग छलक गई।
पनघट वैसा,
नदिया वैसी,
पर मन में अब
शांति बैसी।
गागर उठाई,
धीरे-धीरे,
नैन भरे
बीते सब पीरे।
पग रुके,
जल में देखा,
अपना चेहरा,
सपना रेखा।
जहाँ लिखा था,
नाम दो जन,
रेत में अब
सिर्फ चिन्ह धन।
हवा चली,
मन मुस्काया,
यादों ने फिर
गीत सुनाया।
गोरी बोली,
धीरे स्वर में,
“साजन, तू है
हर लहर में।”
घट भरे,
घर को चली,
रेत पे छोड़ी
छवि भली।
भोर से लेकर
साँझ तलक,
प्रेम रहा —
अविरल, निःशब्द।
महेंद्र मजबूर
सजनी,
तू गई तो हवा भी थम-सी गई...
सावन आया, पर बरस न सका,
शायद तेरे कदमों की आहट का इंतज़ार कर रहा है।
तू बिन —
हर बूँद अधूरी लगती है,
हर खुशबू तेरे नाम में खो जाती है।
रात भर तकिया भीगता रहा,
कोई बादल खिड़की से झाँक गया,
शायद उसे भी तेरी याद आई थी।
नयन बंद करता हूँ —
तो तू आती है...
धीरे से, जैसे पुरानी धुन लौटती है,
और चली जाती है,
ठीक उसी तरह जैसे यादें —
जो रह जाती हैं,
पर मिलती नहीं।
सजनी,
अब जब भी हवा चलती है,
मैं समझता हूँ —
तेरे आँचल ने ज़रा-सा हिला दिया होगा।
बरसों बाद...
आज फिर बारिश आई है,
वैसी ही —
धीरे-धीरे,
छत की मुंडेर से फिसलती बूँदें,
और हवा में तेरी खुशबू का एक कोना...
सजनी,
अब तू याद तो आती है,
पर दर्द नहीं होता —
बस, एक हल्की-सी मुस्कान सी उठती है,
जैसे पुरानी चिट्ठी के किनारे
अभी भी तेरी उँगलियों की गर्मी बची हो।
अब भी कभी-कभी,
बारिश की बूँद जब गाल छू जाती है,
तो लगता है — तूने धीरे से कुछ कहा था,
पर हवा ने सुना नहीं...
तेरे बिना अब भी अधूरा हूँ,
पर अब अधूरापन भी मेरा हिस्सा है,
जैसे टूटी हुई चूड़ी,
जो अब गले लगती नहीं,
पर छोड़ी भी नहीं जाती।
सजनी,
तू जहाँ भी हो —
खुश रहना।
तेरी याद अब मेरा दर्द नहीं,
बस, एक मौसम है —
जो हर सावन लौट आता है...
महेंद्र "मजबूर"©️®️
आज इतना पिला कि साक़ी, होश भी बेवफ़ा हो जाए,
दिल में बसी तस्वीर उसकी, अश्कों में फ़ना हो जाए।
वो जो कभी ख्वाबों का आलम था, अब हकीकत की चुभन है,
जिसे खुदा समझ बैठे थे, अब वही दर्द-ए-वतन है।
रंगीन जहाँ अब बेरंग है, दिल वीरान, न रोशनी,
उसकी यादों के साये में, हर शाम सज़ा हो जाए।
वो वादियाँ, वो दूधिया बादल, अब ख़ामोश पहर में खोए,
कभी जो साथ चलता था, अब बस दुआ हो जाए।
सुन दिल की हर धड़कन में, उसका नाम बसा है गहरा,
हम मुस्कराएँ भी तो दर्द-ए-जुदाई हँसी बना हो जाए।
जो न समझा तमाम उम्र हमें, वही अब ख़यालों में बसता,
जिसे पाने की आरज़ू की थी, अब वही सजा हो जाए।
ऐ साक़ी, आज इतना पिला कि तन्हाई भी साथ छोड़ दे,
इन आँसुओं की आख़िरी बूँद भी रुख़्सत-ए-वफ़ा हो जाए।
"मजबूर" अब क्या कहें तुझसे, ये दिल तो हार गया,
उसकी यादों का ज़हर भी अब जैसे दवा हो जाए...
महेंद्र 'मजबूर'
मित्रवर, सुनो, एक कथा है निराली,
दिन में आई नींद, सपनों की लहरें मतवाली।
जहाँ पंछी बिना भेद उड़ते थे गगन में,
न कोई जात, न कोई धर्म था उनके मन में।
फूलों में सौंधापन, हवाओं में गीत,
झरनों के संग बजता प्रेम का संगीत।
हर चेहरे पे मुस्कान थी बसी,
न कोई दर्द, न कोई कमी थी किसी।
पर तभी खुली आँख, सपना टूट गया,
वो निर्मल जग कहीं पीछे छूट गया।
सामने फिर वही ज़मीन थी बंजर,
जहाँ दिलों में दीवारें थीं गहरी, अंदर।
सोचा — अगर परिंदों में भी होती हमारी सी आग,
तो आसमान भी लाल हो गया होता आज।
वाह रे खुदा, तेरी लीला निराली,
तूने इंसान बनाया — पर दी दुनिया बेहाली।
महेंद्र "मजबूर"
क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गए हैं मंज़िलों की रेस में सब,
चलो फिर इंसान बना जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए...
ना कोई डर, ना कोई शर्म,
ना दुनिया की ये बंदिशें,
बस खुलकर हँस लें ज़रा,
जैसे पहले हँसते थे हम।
मिट्टी की खुशबू, बारिश का खेल,
कागज़ की नावें, वो भीगे मेले।
ना काम का बोझ, ना सोच का डर,
बस सपनों की चादर ओढ़ ली जाए।
क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए...
कभी बहना से झगड़ा, कभी माँ की गोद,
वो छोटी-सी खुशियाँ, वो अपना लोक।
बड़े हुए तो रिश्ते भी दूर हो गए,
चलो अपनों से फिर गले मिला जाए।
कंचों की टकराहट में वो हँसी थी कहीं,
अब सन्नाटों में ढूँढें वो खुशी यहीं।
कुछ पलों को फिर मासूम बनाया जाए,
दिल से फिर बच्चा बन जाया जाए।
क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गई ये दुनिया की चाल,
चलो फिर हँसी में खोया जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए...
महेंद्र "मजबूर"
तेरी यादों का आलम फिर से जी बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...
मेरी चौखट पे खुशियाँ अब नहीं आतीं,
मैंने शायद तक़दीर से जंग कर ली है।
हर दुआ में तेरा नाम लिया मैंने,
और खुद से ही बेवफ़ाई कर ली है।
दिल सीने का हुनर तो सीख गया हूँ,
पर दर्द को छिपाना अब भूल गया हूँ।
तेरी चाहत को गुनाह समझ कर भी,
उस गुनाह में सुकून पा बैठा हूँ।
आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरे बिना भी तेरा इंतज़ार कर बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...
तुझे पाने की ज़िद थी या इबादत मेरी,
हर स्वप्न में तेरी छवि सजा बैठा हूँ।
अब ना रूठना, ऐ मलिकाए हुस्न,
तेरी "हाँ" में कुछ साँसें बचा बैठा हूँ।
तू आए न आए, ये तुझ पे छोड़ दिया,
पर दिल ने तेरा नाम अमर कर लिया।
इस मोहब्बत को नसीब मान कर,
हर दर्द को भी प्यार कर बैठा हूँ।
आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरी यादों से अब तक जी रहा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
पर तुझसे ही फिर मोहब्बत कर बैठा हूँ...
"मजबूर"
सितम जुदाई का सहूँ कैसे,
तु ही बता, तुझ बिन रहूँ कैसे।
हर राह वीरान लगती है,
तेरे बिन ये जहाँ सुना लगता है।
ना पनघट पे रुनझुन पायल की,
ना बसंत में रंग बहारों के,
तेरी यादों का झोंका जब आता,
दिल में लहर सी उमड़ जाती है।
हवा संग आती तेरी महक,
जैसे तू पास खड़ी मुस्काती है,
बंद आँखों में तेरा चेहरा उभरता,
और आँसू छलक ही जाते हैं।
अब लौट आ, ना देर कर,
तेरे बिन सांसें भी थम जाती हैं।
तु ही बता, ओ प्राण मेरे,
तुझ बिन ये जिंदगी चले कैसे...
मजबूर
साँसें चल रही हैं, तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं,
टूटी ख्वाहिशों के बीच भी, धड़कता सा जिन्दा हूँ मैं।
ना अपना रहा, ना पराया कोई,
इस भीड़ में खुद से ही अनजाना हूँ मैं।
रंग उड़ गए सब ज़िन्दगी के,
बस राख सी रह गई खुशी की।
बसंत पतझड़ में बदल गया,
दिल में अब भी हलचल सी।
वाह रे ख़ुदा, तेरी लिखी कहानी,
क्यों लगती इतनी वीरानी।
मिटाने की कोशिश हर बार की,
पर तक़दीर तेरी अमिट निशानी।
भँवरों में फँसी है नैया मेरी,
रिश्तों की लहरें भारी हैं।
फिर भी पतवार थामे हूँ मैं,
उम्मीद की डोर जारी है।
कभी रोता हूँ, कभी हँसता हूँ,
हर दर्द में जीने की रस्म निभाता हूँ।
ग़मों से लिपटी ये ज़िन्दगी सही,
पर अभी... हाँ, ज़िंदा हूँ मैं अभी।
कल शायद सूरज फिर उगे,
किसी मोड़ पर खुशियाँ मिलें।
आज थका हूँ, टूटा हूँ सही,
पर कल फिर मुस्कुराऊँगा —
क्योंकि साँसें चल रही हैं...
और मैं अभी ज़िंदा हूँ।
महेंद्र मजबूर