शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

"वो जो चला गया"


वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुस्कुराकर, खामोशियों में कुछ कह गया।
ना अलविदा कहा, ना मुड़कर देखा,
बस हवाओं में अपनी खुशबू छोड़ गया।
कभी लगता है, अब सब ठीक है,
पर दिल के किसी कोने में तू अब भी ज़िंदा है।
तेरी हँसी, तेरी बातें, तेरे वो छोटे इशारे,
हर रोज़ एक नया ज़ख्म दे जाते हैं।
रातें अब भी तेरे नाम की होती हैं,
नींद आती है, मगर चैन नहीं।
तकिए के उस पार अब भी तेरा ख्याल सोता है,
और मेरी आँखें बस उसे जगाती रहती हैं।
वो चाँद, जो कभी तेरे साथ देखा था,
अब भी उतना ही रोशन है,
बस फर्क इतना है कि अब वो मुझसे पूछता नहीं,
“क्यों तेरा चेहरा उदास है?”
कभी सोचता हूँ, तुझसे फिर मुलाक़ात हो जाए,
कहीं राहों में, यूँ ही बेख़्याल हो जाए।
क्या तू पहचानेगा मुझे?
या फिर किसी अनजान की तरह नज़रें चुरा ले जाएगा?
तेरे वादे अब भी मेरी सांसों में गूंजते हैं,
तेरे झूठ अब भी सच लगते हैं।
हर ख़ुशी, हर हँसी, हर जश्न में,
तेरे नाम का साया दिखता है।
लोग कहते हैं—“वक़्त सब ठीक कर देता है”,
पर वक़्त ने बस मुझे खामोश करना सिखाया है।
ज़ख्म तो भर जाते हैं, मगर निशान,
वो अब भी तेरे नाम के हैं।
अब मैं चलता हूँ उसी रास्ते पर,
जहाँ तू कभी मेरे साथ था।
हवा अब भी वैसी ही चलती है,
बस उसमें तेरी आवाज़ नहीं आती।
तेरे जाने से ज़िन्दगी नहीं रुकी,
पर जीने का मतलब कहीं खो गया।
अब जो मुस्कुराता हूँ, तो लगता है,
मानो तेरी यादों से समझौता कर रहा हूँ।
वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुझे तन्हा करने नहीं—
मुझे मेरे भीतर के “मैं” से मिलाने चला गया। 

महेंद्र 'मजबूर'

रविवार, 26 जून 2016

तलाश

जीवन

रेत

सा

तुम
मरिचिका

भटकन
दिल

तलाश
प्यास

प्रेम
दूर

धूप
जलन

रेत
अंतहीन

कदम
थके

सांस
रुकी

फिर
खुशबू

हवा
छुई

तुम
उतरी

पलकों
पर

सच
बनी

कंठ
तर

दिल
भरा

धूप
दुलार

रेगिस्तान
मुस्कुराया

ओस
गिरी

नाम
तेरा

जीवन
मिला।

जीवन
रेत

तुम
मरीचिका

दिल
भटका

प्यास
जगी

धूप
चुभी

रेत
झरी

कदम
थके

सांस
रुकी

हवा
बही

खुशबू
आई

तुम
उतरी

नज़र
भीगी

कंठ
तरा

धूप
मुलायम

रेत
गुनगुनी

दिल
हँसा

ओस
गिरी

नाम
तेरा

जीवन
खिला।

महेंद्र 'मजबूर'


पनघट की गोरी

एक प्रेम कथा — रेत, नदिया और स्मृतियों के बीच

भाग १ — “गोरी पनघट पे”

छम छम पायल,
बजे रे गोरी,
घाट किनारे
खड़ी ठठोली।

नील गगन में
उड़े अँचरा,
धूप पिए
जल में सवेरा।

नैन कटारी,
हँसी चकोरी,
बोले कुछ ना,
कहे सब गोरी।

हाथ कंगना,
चूड़ी छनके,
घट उठावे
मृदु तन थरके।

झर-झर नदिया,
गीत सुनावे,
प्रीत पुरानी
फिर बहकावे।

कछु ना बोले,
मन मुस्कावे,
पनघट वाला
नयन मिलावे।

भाग २ — “साँझ ढले गोरी”

साँझ ढले रे,
गोरी आई,
धूप झरे,
छाँव समाई।

घट में पानी,
नयन में सपना,
पग में थिरकन,
मन में अपना।

चाँद झुके रे,
नीर चमकाए,
गोरी झुके तो
बिंदिया जगमगाए।

डरती बोले,
धीरे-धीरे,
“मत देखो यूँ,
नयन पगीरे।”

पवन बहे तो,
चूनर डोले,
बन के बिजली,
तन पे बोले।

घर की देहरी,
नज़दीक आई,
पीछे मुड़ के
मुस्कुराई।

मन कहे धीरे —
फिर पनघट पे,
कल ही आऊँ,
ओ रे सजन।

भाग ३ — “भोर भये पनघट”

भोर भये रे,
गोरी आई,
नींद नयन की
ओस बन पाई।

घट उठावे,
गुनगुन गावे,
मन में छुपा
गीत सुनावे।

झर-झर नदिया,
संग बहाए,
चुनरी छूके
हवा लजाए।

साजन आया,
धीरे बोला,
“गोरी रुक जा,
दिल मत तोला।”

गोरी हँसी,
नैन झुकाए,
गागर हिलते
प्रीत छलकाए।

रेत पे लिखे,
दो नाम सजन,
लहर ने ढाके,
फिर दे चुम्बन।

भोर सजीली,
धूप सुहानी,
पनघट बन गया —
प्रेम कहानी।

भाग ४ — “फिर पनघट आई”

बरस बीते,
धूप बदल गई,
गोरी की चूनर
रंग छलक गई।

पनघट वैसा,
नदिया वैसी,
पर मन में अब
शांति बैसी।

गागर उठाई,
धीरे-धीरे,
नैन भरे
बीते सब पीरे।

पग रुके,
जल में देखा,
अपना चेहरा,
सपना रेखा।

जहाँ लिखा था,
नाम दो जन,
रेत में अब
सिर्फ चिन्ह धन।

हवा चली,
मन मुस्काया,
यादों ने फिर
गीत सुनाया।

गोरी बोली,
धीरे स्वर में,
“साजन, तू है
हर लहर में।”

घट भरे,
घर को चली,
रेत पे छोड़ी
छवि भली।

भोर से लेकर
साँझ तलक,
प्रेम रहा —
अविरल, निःशब्द।

महेंद्र मजबूर 

सोमवार, 20 जून 2016

सुदामा


कलम मेरी आज रो पडी
जब मन के भाव वो जान गई।
सुनाउ एक करूण कहानी
पत्नि बोली रुन्धे गले
स्वामी मै भूखी रह लुंगी
पर
नाथ मेरे इन बच्चो को
भूख तडपावे
सुन सुदामा की अखियन आंसू फुटे
बोले
तुही बता क्या करु मेरे करम फुटे
मांगण की नही आदत मोहे
ना धरम देत स्वीकृति
पत्नी सुझायो एक मारग
बोली दीन सुदामा से
स्वामी सखा थे तोरे
कोई नंददुलारे
सुना सखियन सु
राजन है वह बड भागे
स्वामी क्यो ना मिल आये
मित्रता का दे वास्ता
कछु याचना कर आये
सुदामा की भीगी अखियन
बहा अश्रु स्वीकृति दिनी
बान्ध लाई कछु चावल पोटली
दीना सुदामा हाथ
करुण काया करूण दशा
चलत सुदामा मित्र द्वार द्वारिकानाथ 

महेंद्र 'मजबूर'

रविवार, 19 जून 2016

सजनी

सजनी,
तू गई तो हवा भी थम-सी गई...
सावन आया, पर बरस न सका,
शायद तेरे कदमों की आहट का इंतज़ार कर रहा है।

तू बिन —
हर बूँद अधूरी लगती है,
हर खुशबू तेरे नाम में खो जाती है।

रात भर तकिया भीगता रहा,
कोई बादल खिड़की से झाँक गया,
शायद उसे भी तेरी याद आई थी।

नयन बंद करता हूँ —
तो तू आती है...
धीरे से, जैसे पुरानी धुन लौटती है,
और चली जाती है,
ठीक उसी तरह जैसे यादें —
जो रह जाती हैं,
पर मिलती नहीं।

सजनी,
अब जब भी हवा चलती है,
मैं समझता हूँ —
तेरे आँचल ने ज़रा-सा हिला दिया होगा।



बरसों बाद...
आज फिर बारिश आई है,
वैसी ही —
धीरे-धीरे,
छत की मुंडेर से फिसलती बूँदें,
और हवा में तेरी खुशबू का एक कोना...

सजनी,
अब तू याद तो आती है,
पर दर्द नहीं होता —
बस, एक हल्की-सी मुस्कान सी उठती है,
जैसे पुरानी चिट्ठी के किनारे
अभी भी तेरी उँगलियों की गर्मी बची हो।

अब भी कभी-कभी,
बारिश की बूँद जब गाल छू जाती है,
तो लगता है — तूने धीरे से कुछ कहा था,
पर हवा ने सुना नहीं...

तेरे बिना अब भी अधूरा हूँ,
पर अब अधूरापन भी मेरा हिस्सा है,
जैसे टूटी हुई चूड़ी,
जो अब गले लगती नहीं,
पर छोड़ी भी नहीं जाती।

सजनी,
तू जहाँ भी हो —
खुश रहना।
तेरी याद अब मेरा दर्द नहीं,
बस, एक मौसम है —
जो हर सावन लौट आता है... 

महेंद्र "मजबूर"©️®️

शनिवार, 18 जून 2016

तस्वीर उसकी

आज इतना पिला कि साक़ी

आज इतना पिला कि साक़ी, होश भी बेवफ़ा हो जाए,
दिल में बसी तस्वीर उसकी, अश्कों में फ़ना हो जाए।

वो जो कभी ख्वाबों का आलम था, अब हकीकत की चुभन है,
जिसे खुदा समझ बैठे थे, अब वही दर्द-ए-वतन है।

रंगीन जहाँ अब बेरंग है, दिल वीरान, न रोशनी,
उसकी यादों के साये में, हर शाम सज़ा हो जाए।

वो वादियाँ, वो दूधिया बादल, अब ख़ामोश पहर में खोए,
कभी जो साथ चलता था, अब बस दुआ हो जाए।

सुन दिल की हर धड़कन में, उसका नाम बसा है गहरा,
हम मुस्कराएँ भी तो दर्द-ए-जुदाई हँसी बना हो जाए।

जो न समझा तमाम उम्र हमें, वही अब ख़यालों में बसता,
जिसे पाने की आरज़ू की थी, अब वही सजा हो जाए।

ऐ साक़ी, आज इतना पिला कि तन्हाई भी साथ छोड़ दे,
इन आँसुओं की आख़िरी बूँद भी रुख़्सत-ए-वफ़ा हो जाए।


"मजबूर" अब क्या कहें तुझसे, ये दिल तो हार गया,
उसकी यादों का ज़हर भी अब जैसे दवा हो जाए... 

महेंद्र 'मजबूर'

अधूरा स्वप्न


मित्रवर, सुनो, एक कथा है निराली,
दिन में आई नींद, सपनों की लहरें मतवाली।
जहाँ पंछी बिना भेद उड़ते थे गगन में,
न कोई जात, न कोई धर्म था उनके मन में।

फूलों में सौंधापन, हवाओं में गीत,
झरनों के संग बजता प्रेम का संगीत।
हर चेहरे पे मुस्कान थी बसी,
न कोई दर्द, न कोई कमी थी किसी।

पर तभी खुली आँख, सपना टूट गया,
वो निर्मल जग कहीं पीछे छूट गया।
सामने फिर वही ज़मीन थी बंजर,
जहाँ दिलों में दीवारें थीं गहरी, अंदर।

सोचा — अगर परिंदों में भी होती हमारी सी आग,
तो आसमान भी लाल हो गया होता आज।
वाह रे खुदा, तेरी लीला निराली,
तूने इंसान बनाया — पर दी दुनिया बेहाली।

महेंद्र "मजबूर"

शुक्रवार, 17 जून 2016

बचपन की हँसी


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गए हैं मंज़िलों की रेस में सब,
चलो फिर इंसान बना जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए...

ना कोई डर, ना कोई शर्म,
ना दुनिया की ये बंदिशें,
बस खुलकर हँस लें ज़रा,
जैसे पहले हँसते थे हम।

मिट्टी की खुशबू, बारिश का खेल,
कागज़ की नावें, वो भीगे मेले।
ना काम का बोझ, ना सोच का डर,
बस सपनों की चादर ओढ़ ली जाए।


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए... 

कभी बहना से झगड़ा, कभी माँ की गोद,
वो छोटी-सी खुशियाँ, वो अपना लोक।
बड़े हुए तो रिश्ते भी दूर हो गए,
चलो अपनों से फिर गले मिला जाए।

कंचों की टकराहट में वो हँसी थी कहीं,
अब सन्नाटों में ढूँढें वो खुशी यहीं।
कुछ पलों को फिर मासूम बनाया जाए,
दिल से फिर बच्चा बन जाया जाए।


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गई ये दुनिया की चाल,
चलो फिर हँसी में खोया जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए... 

महेंद्र "मजबूर"

मंगलवार, 14 जून 2016

आरजु ए दीदार

आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,

तेरी यादों का आलम फिर से जी बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...



मेरी चौखट पे खुशियाँ अब नहीं आतीं,
मैंने शायद तक़दीर से जंग कर ली है।
हर दुआ में तेरा नाम लिया मैंने,
और खुद से ही बेवफ़ाई कर ली है।

दिल सीने का हुनर तो सीख गया हूँ,
पर दर्द को छिपाना अब भूल गया हूँ।
तेरी चाहत को गुनाह समझ कर भी,
उस गुनाह में सुकून पा बैठा हूँ।



आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरे बिना भी तेरा इंतज़ार कर बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...



तुझे पाने की ज़िद थी या इबादत मेरी,
हर स्वप्न में तेरी छवि सजा बैठा हूँ।
अब ना रूठना, ऐ मलिकाए हुस्न,
तेरी "हाँ" में कुछ साँसें बचा बैठा हूँ।

तू आए न आए, ये तुझ पे छोड़ दिया,
पर दिल ने तेरा नाम अमर कर लिया।
इस मोहब्बत को नसीब मान कर,
हर दर्द को भी प्यार कर बैठा हूँ।



आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरी यादों से अब तक जी रहा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
पर तुझसे ही फिर मोहब्बत कर बैठा हूँ... 

"मजबूर"

रविवार, 12 जून 2016

अल्फ़ाज़

कलम हाथ ले चंद अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।
कभी आँसु कभी मुस्कान लिखता हूँ।
ख्वाहिशो के समंदर मे
हकीकत के दो शब्द
तुझ संग बिताए जो पल वो पल लिखता हूँ।
तुझ से बिछडना और
तुझे मेरी याद ना आना
ऐसे कई अनगिनत सवाल लिखता हूँ।
कलम हाथ ले चंद अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।
कभी आँसु कभी मुस्कान लिखता हूँ।
जब छू गया था लब मेरे तू
बे जबान तब से लिखता हूँ।
कभी राझना कभी महीवाल कभी मजनुँ लिखता हूँ
प्यार के तराने है कुछ ऐसे जनाब की
आँसुओं कि स्याही से उनका दीदार लिखता हूँ।
जाने क्यो छोड जाते सब मुझे
भीगी मुस्कान से तन्हाई लिखता हूँ।
कलम हाथ ले चंद अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।
कभी आँसु कभी मुस्कान लिखता हूँ।
महेंद्र " मजबूर "

गुरुवार, 9 जून 2016

पुरानी चप्पल

आखिर साथ छोड़ दिया
मेरी पुरानी चप्पल ने।
मेरी सुख दुख सहभागी बन
हर राह सुगम किया
दुख तो हुआ बहुत
काश कुछ और साथ दिया होता
गरीब हुँ उपर से पढा लिखा अनपढ बेरोजगार
अछे दिन आने वाले है
आए नही
कैसे सिऊ अब
दो बार सी चुका हुँ
पर फैक भी नही सकता
नंगे पाव रहु
मेरी औकात दिख जाएगी
जमाने से जो छिपाई थी
प्रेम बहुत है झुठे आवरण से
आखिर कुछ तो करना होगा
मुरझाया सा बैठा सोचता हुँ
इज्जत  ढकु की पाँव
काश अछे दिन तक रूक जाती
मेरी पुरानी चप्पल।

तुझ बिन


सितम जुदाई का सहूँ कैसे,
तु ही बता, तुझ बिन रहूँ कैसे।
हर राह वीरान लगती है,
तेरे बिन ये जहाँ सुना लगता है।

ना पनघट पे रुनझुन पायल की,
ना बसंत में रंग बहारों के,
तेरी यादों का झोंका जब आता,
दिल में लहर सी उमड़ जाती है।

हवा संग आती तेरी महक,
जैसे तू पास खड़ी मुस्काती है,
बंद आँखों में तेरा चेहरा उभरता,
और आँसू छलक ही जाते हैं।

अब लौट आ, ना देर कर,
तेरे बिन सांसें भी थम जाती हैं।
तु ही बता, ओ प्राण मेरे,
तुझ बिन ये जिंदगी चले कैसे...

मजबूर 

जिन्दा हूँ मै।