मंगलवार, 14 जून 2016

आरजु ए दीदार

आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,

तेरी यादों का आलम फिर से जी बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...



मेरी चौखट पे खुशियाँ अब नहीं आतीं,
मैंने शायद तक़दीर से जंग कर ली है।
हर दुआ में तेरा नाम लिया मैंने,
और खुद से ही बेवफ़ाई कर ली है।

दिल सीने का हुनर तो सीख गया हूँ,
पर दर्द को छिपाना अब भूल गया हूँ।
तेरी चाहत को गुनाह समझ कर भी,
उस गुनाह में सुकून पा बैठा हूँ।



आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरे बिना भी तेरा इंतज़ार कर बैठा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कर बैठा हूँ...



तुझे पाने की ज़िद थी या इबादत मेरी,
हर स्वप्न में तेरी छवि सजा बैठा हूँ।
अब ना रूठना, ऐ मलिकाए हुस्न,
तेरी "हाँ" में कुछ साँसें बचा बैठा हूँ।

तू आए न आए, ये तुझ पे छोड़ दिया,
पर दिल ने तेरा नाम अमर कर लिया।
इस मोहब्बत को नसीब मान कर,
हर दर्द को भी प्यार कर बैठा हूँ।



आरज़ू-ए-दीदार दिल में दफ़न कर बैठा हूँ,
तेरी यादों से अब तक जी रहा हूँ।
जानता था टूटेगा दिल मेरा यार,
पर तुझसे ही फिर मोहब्बत कर बैठा हूँ... 

"मजबूर"

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