साँसें चल रही हैं, तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं,
टूटी ख्वाहिशों के बीच भी, धड़कता सा जिन्दा हूँ मैं।
ना अपना रहा, ना पराया कोई,
इस भीड़ में खुद से ही अनजाना हूँ मैं।
रंग उड़ गए सब ज़िन्दगी के,
बस राख सी रह गई खुशी की।
बसंत पतझड़ में बदल गया,
दिल में अब भी हलचल सी।
वाह रे ख़ुदा, तेरी लिखी कहानी,
क्यों लगती इतनी वीरानी।
मिटाने की कोशिश हर बार की,
पर तक़दीर तेरी अमिट निशानी।
भँवरों में फँसी है नैया मेरी,
रिश्तों की लहरें भारी हैं।
फिर भी पतवार थामे हूँ मैं,
उम्मीद की डोर जारी है।
कभी रोता हूँ, कभी हँसता हूँ,
हर दर्द में जीने की रस्म निभाता हूँ।
ग़मों से लिपटी ये ज़िन्दगी सही,
पर अभी... हाँ, ज़िंदा हूँ मैं अभी।
कल शायद सूरज फिर उगे,
किसी मोड़ पर खुशियाँ मिलें।
आज थका हूँ, टूटा हूँ सही,
पर कल फिर मुस्कुराऊँगा —
क्योंकि साँसें चल रही हैं...
और मैं अभी ज़िंदा हूँ।
महेंद्र मजबूर
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