आज इतना पिला कि साक़ी, होश भी बेवफ़ा हो जाए,
दिल में बसी तस्वीर उसकी, अश्कों में फ़ना हो जाए।
वो जो कभी ख्वाबों का आलम था, अब हकीकत की चुभन है,
जिसे खुदा समझ बैठे थे, अब वही दर्द-ए-वतन है।
रंगीन जहाँ अब बेरंग है, दिल वीरान, न रोशनी,
उसकी यादों के साये में, हर शाम सज़ा हो जाए।
वो वादियाँ, वो दूधिया बादल, अब ख़ामोश पहर में खोए,
कभी जो साथ चलता था, अब बस दुआ हो जाए।
सुन दिल की हर धड़कन में, उसका नाम बसा है गहरा,
हम मुस्कराएँ भी तो दर्द-ए-जुदाई हँसी बना हो जाए।
जो न समझा तमाम उम्र हमें, वही अब ख़यालों में बसता,
जिसे पाने की आरज़ू की थी, अब वही सजा हो जाए।
ऐ साक़ी, आज इतना पिला कि तन्हाई भी साथ छोड़ दे,
इन आँसुओं की आख़िरी बूँद भी रुख़्सत-ए-वफ़ा हो जाए।
"मजबूर" अब क्या कहें तुझसे, ये दिल तो हार गया,
उसकी यादों का ज़हर भी अब जैसे दवा हो जाए...
महेंद्र 'मजबूर'
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