सोमवार, 20 जून 2016

सुदामा


कलम मेरी आज रो पडी
जब मन के भाव वो जान गई।
सुनाउ एक करूण कहानी
पत्नि बोली रुन्धे गले
स्वामी मै भूखी रह लुंगी
पर
नाथ मेरे इन बच्चो को
भूख तडपावे
सुन सुदामा की अखियन आंसू फुटे
बोले
तुही बता क्या करु मेरे करम फुटे
मांगण की नही आदत मोहे
ना धरम देत स्वीकृति
पत्नी सुझायो एक मारग
बोली दीन सुदामा से
स्वामी सखा थे तोरे
कोई नंददुलारे
सुना सखियन सु
राजन है वह बड भागे
स्वामी क्यो ना मिल आये
मित्रता का दे वास्ता
कछु याचना कर आये
सुदामा की भीगी अखियन
बहा अश्रु स्वीकृति दिनी
बान्ध लाई कछु चावल पोटली
दीना सुदामा हाथ
करुण काया करूण दशा
चलत सुदामा मित्र द्वार द्वारिकानाथ 

महेंद्र 'मजबूर'

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