शुक्रवार, 17 जून 2016

बचपन की हँसी


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गए हैं मंज़िलों की रेस में सब,
चलो फिर इंसान बना जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए...

ना कोई डर, ना कोई शर्म,
ना दुनिया की ये बंदिशें,
बस खुलकर हँस लें ज़रा,
जैसे पहले हँसते थे हम।

मिट्टी की खुशबू, बारिश का खेल,
कागज़ की नावें, वो भीगे मेले।
ना काम का बोझ, ना सोच का डर,
बस सपनों की चादर ओढ़ ली जाए।


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए... 

कभी बहना से झगड़ा, कभी माँ की गोद,
वो छोटी-सी खुशियाँ, वो अपना लोक।
बड़े हुए तो रिश्ते भी दूर हो गए,
चलो अपनों से फिर गले मिला जाए।

कंचों की टकराहट में वो हँसी थी कहीं,
अब सन्नाटों में ढूँढें वो खुशी यहीं।
कुछ पलों को फिर मासूम बनाया जाए,
दिल से फिर बच्चा बन जाया जाए।


क्यों ना आज यत्न किया जाए,
चलो कुछ पल के लिए फिर से बचपन जी लिया जाए।
थक गई ये दुनिया की चाल,
चलो फिर हँसी में खोया जाए...
क्यों ना आज यत्न किया जाए... 

महेंद्र "मजबूर"

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