सजनी,
तू गई तो हवा भी थम-सी गई...
सावन आया, पर बरस न सका,
शायद तेरे कदमों की आहट का इंतज़ार कर रहा है।
तू बिन —
हर बूँद अधूरी लगती है,
हर खुशबू तेरे नाम में खो जाती है।
रात भर तकिया भीगता रहा,
कोई बादल खिड़की से झाँक गया,
शायद उसे भी तेरी याद आई थी।
नयन बंद करता हूँ —
तो तू आती है...
धीरे से, जैसे पुरानी धुन लौटती है,
और चली जाती है,
ठीक उसी तरह जैसे यादें —
जो रह जाती हैं,
पर मिलती नहीं।
सजनी,
अब जब भी हवा चलती है,
मैं समझता हूँ —
तेरे आँचल ने ज़रा-सा हिला दिया होगा।
बरसों बाद...
आज फिर बारिश आई है,
वैसी ही —
धीरे-धीरे,
छत की मुंडेर से फिसलती बूँदें,
और हवा में तेरी खुशबू का एक कोना...
सजनी,
अब तू याद तो आती है,
पर दर्द नहीं होता —
बस, एक हल्की-सी मुस्कान सी उठती है,
जैसे पुरानी चिट्ठी के किनारे
अभी भी तेरी उँगलियों की गर्मी बची हो।
अब भी कभी-कभी,
बारिश की बूँद जब गाल छू जाती है,
तो लगता है — तूने धीरे से कुछ कहा था,
पर हवा ने सुना नहीं...
तेरे बिना अब भी अधूरा हूँ,
पर अब अधूरापन भी मेरा हिस्सा है,
जैसे टूटी हुई चूड़ी,
जो अब गले लगती नहीं,
पर छोड़ी भी नहीं जाती।
सजनी,
तू जहाँ भी हो —
खुश रहना।
तेरी याद अब मेरा दर्द नहीं,
बस, एक मौसम है —
जो हर सावन लौट आता है...
महेंद्र "मजबूर"©️®️
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