गुरुवार, 9 जून 2016

पुरानी चप्पल

आखिर साथ छोड़ दिया
मेरी पुरानी चप्पल ने।
मेरी सुख दुख सहभागी बन
हर राह सुगम किया
दुख तो हुआ बहुत
काश कुछ और साथ दिया होता
गरीब हुँ उपर से पढा लिखा अनपढ बेरोजगार
अछे दिन आने वाले है
आए नही
कैसे सिऊ अब
दो बार सी चुका हुँ
पर फैक भी नही सकता
नंगे पाव रहु
मेरी औकात दिख जाएगी
जमाने से जो छिपाई थी
प्रेम बहुत है झुठे आवरण से
आखिर कुछ तो करना होगा
मुरझाया सा बैठा सोचता हुँ
इज्जत  ढकु की पाँव
काश अछे दिन तक रूक जाती
मेरी पुरानी चप्पल।

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