एक प्रेम कथा — रेत, नदिया और स्मृतियों के बीच
भाग १ — “गोरी पनघट पे”
छम छम पायल,
बजे रे गोरी,
घाट किनारे
खड़ी ठठोली।
नील गगन में
उड़े अँचरा,
धूप पिए
जल में सवेरा।
नैन कटारी,
हँसी चकोरी,
बोले कुछ ना,
कहे सब गोरी।
हाथ कंगना,
चूड़ी छनके,
घट उठावे
मृदु तन थरके।
झर-झर नदिया,
गीत सुनावे,
प्रीत पुरानी
फिर बहकावे।
कछु ना बोले,
मन मुस्कावे,
पनघट वाला
नयन मिलावे।
भाग २ — “साँझ ढले गोरी”
साँझ ढले रे,
गोरी आई,
धूप झरे,
छाँव समाई।
घट में पानी,
नयन में सपना,
पग में थिरकन,
मन में अपना।
चाँद झुके रे,
नीर चमकाए,
गोरी झुके तो
बिंदिया जगमगाए।
डरती बोले,
धीरे-धीरे,
“मत देखो यूँ,
नयन पगीरे।”
पवन बहे तो,
चूनर डोले,
बन के बिजली,
तन पे बोले।
घर की देहरी,
नज़दीक आई,
पीछे मुड़ के
मुस्कुराई।
मन कहे धीरे —
फिर पनघट पे,
कल ही आऊँ,
ओ रे सजन।
भाग ३ — “भोर भये पनघट”
भोर भये रे,
गोरी आई,
नींद नयन की
ओस बन पाई।
घट उठावे,
गुनगुन गावे,
मन में छुपा
गीत सुनावे।
झर-झर नदिया,
संग बहाए,
चुनरी छूके
हवा लजाए।
साजन आया,
धीरे बोला,
“गोरी रुक जा,
दिल मत तोला।”
गोरी हँसी,
नैन झुकाए,
गागर हिलते
प्रीत छलकाए।
रेत पे लिखे,
दो नाम सजन,
लहर ने ढाके,
फिर दे चुम्बन।
भोर सजीली,
धूप सुहानी,
पनघट बन गया —
प्रेम कहानी।
भाग ४ — “फिर पनघट आई”
बरस बीते,
धूप बदल गई,
गोरी की चूनर
रंग छलक गई।
पनघट वैसा,
नदिया वैसी,
पर मन में अब
शांति बैसी।
गागर उठाई,
धीरे-धीरे,
नैन भरे
बीते सब पीरे।
पग रुके,
जल में देखा,
अपना चेहरा,
सपना रेखा।
जहाँ लिखा था,
नाम दो जन,
रेत में अब
सिर्फ चिन्ह धन।
हवा चली,
मन मुस्काया,
यादों ने फिर
गीत सुनाया।
गोरी बोली,
धीरे स्वर में,
“साजन, तू है
हर लहर में।”
घट भरे,
घर को चली,
रेत पे छोड़ी
छवि भली।
भोर से लेकर
साँझ तलक,
प्रेम रहा —
अविरल, निःशब्द।
महेंद्र मजबूर
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