रविवार, 30 नवंबर 2025

तुम्हारा प्रेम

 कितना छोटा-सा प्रेम था तुम्हारा,

मानो किसी मौसम की घड़ी—
आया, ठहरा,
और कुछ ही पलों में लौट गया।

पर मेरा प्रेम…
वह किसी नदी की तरह है—
धीमी, लगातार बहती हुई,
चट्टानों से टकराकर भी
अपना स्वर नहीं खोती।

तुम्हारा स्नेह तो
थोड़ी-सी धूप जैसा था—
जिसे बादलों ने छुपा लिया।
मेरा प्रेम उस मिट्टी जैसा है
जो धूप-छाँव हर बार सहकर भी
अपनी खुशबू नहीं छोड़ती।

मैंने तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा—
शब्द खुद तुम्हारी ओर खिंचते चले आए।
अब ये पन्ने
मेरे जिये हुए दिनों की तरह
तुम्हारी छाया सँभाले बैठे हैं।

तुम रहो या न रहो,
मेरे भीतर एक धीमी-सी लौ जलती रहेगी,
जो प्रेम को कम नहीं होने देगी—
जो मेरे बाद भी कहेगी,
उसी शांत-सी करुण मुस्कान के साथ—

तुम हो… ना हो…
मेरा प्रेम तो रहेगा ही।

महेंद्र मजबूर 


जाता हुआ नवम्बर

 जाता हुआ नवम्बर

जैसे कोई आख़िरी चिट्ठी बिना पढ़े रखी रह जाए,
और हम सोचते रहें—
इसमें क्या लिखा होगा?

मौसम बदलता है
तो पता चलता है
कि सिर्फ़ हवा ठंडी नहीं होती,
कुछ रिश्ते भी ठंडे पड़ने लगते हैं।

साल बदल रहा है—
कैलेंडर में नहीं,
हमारी आदतों में,
हमारी चुपियों में,
उन सवालों में जिनके जवाब
कभी मिल ही नहीं पाते।

लोग बदलते हैं,
और हम सोचते रहते हैं
कि शायद अगली बार वे वहीं मिलेंगे
जहाँ हमने छोड़ा था—
पर कोई भी वहीं नहीं मिलता।

वक़्त बदलता है
तो हम समझते हैं
कि कहानियाँ बस लिखी नहीं जातीं,
वे मिटती भी रहती हैं
जैसे किसी पुराने फोटो में
चेहरे धीरे-धीरे धुँधले हो जाते हैं।

ज़िंदगी…
वह चलती तो है,
पर हर मोड़ पर थोड़ी टूटती भी है।
किसी से प्यार करते-करते
हम खुद को खो भी देते हैं,
और पाते भी हैं।

जाता हुआ नवम्बर
सिर्फ़ मौसम नहीं,
वह एक नोट है—
जो कहता है:
चलो आगे,
जहाँ जो भी बदलेगा
वही सच होगा।

महेंद्र 'मजबूर'©️®️

शनिवार, 29 नवंबर 2025

बेवफाई

 मेरी आँखों से गिरा आँसू—सवाल-ए-बेवफ़ाई है,

तेरी पलकों से जो टपका वो गवाह-ए-बेवफ़ाई है।

तू गया तो सच कहूँ दिल पर अभी तक है चुभन बाकी,
तेरी यादों का समुन्दर आज राह-ए-बेवफ़ाई है।

तेरे वादों पर यक़ीं था, इश्क़ में हसरतें भी थीं,
वक़्त के हाथों ये सब कुछ बस दास्तान-ए-बेवफ़ाई है।

मेरा रंजिश में भी तेरे नाम का ही ज़िक्र रहता है,
हर एहसास-ए-वफ़ा अब बस फ़साना-ए-बेवफ़ाई है।

तू लौटे भी तो दिल पर फिर वही पड़ जाएगी दरार,
जो टूटा है वो टूटा है—नसीहत-ए-बेवफ़ाई है।

-महेंद्र ‘मजबूर’

मैं पुरुष हूँ, पत्थर नहीं।

 मैं पुरुष हूँ,

पत्थर नहीं।


मैं भी प्रताड़ित होता हूं,

मैं भी घुटता हूं…

अंदर ही अंदर पिसता हूं,

टूटकर भी मुस्कुराता हूं,

बिखरकर भी संभल जाता हूं।


मैं रो नहीं पाता,

कह नहीं पाता,

दिल की हर दरार भीतर ही समेट लेता हूं।

पत्थर नहीं हूं…

बस समय ने जकड़ लिया है मुझे,

मैं भी किसी कंधे पर सिर रखकर

फूट-फूटकर रो लेना चाहता हूं।


मैं भी तरस जाता हूं

किसी के स्पर्श-भर के प्यार को,

एक शब्द की तसल्ली को,

एक पल की राहत को।


मगर मैं पुरुष हूं—

सो खामोशी मेरी पहचान बना दी गई,

मजबूती मेरी मजबूरी कह दी गई,

आंसुओं को हार का ताज पहना दिया गया।


पर आज कहता हूं—

मैं भी इंसान हूं,

मेरी भी धड़कनें हैं, डर हैं, थकान है,

मेरी भी एक दुनिया है जो टूटती-सी लगती है।


मैं पुरुष हूं…

पर पत्थर नहीं।

मैं भी पिघलना चाहता हूं,

जीना चाहता हूं,

सुन लिया जाऊं—

बस इतना चाहता हूं।


-महेंद्र 'मजबूर'

मै ही प्रतिवादी

 

मैं देखता हूँ—
दूसरों की कमियों का विराट जंगल,
जहाँ दोषों की लतरें साँप-सी फुफकारती हैं,
और मैं, एक शिकारी की तरह,
निशाने साधता हूँ हर अँधेरे पर।

पर अचानक—
मेरे भीतर की नंगी दीवारें हिलने लगती हैं,
मेरे ही मन की दरारों से
किसी गहरे अपराध की गंध उठती है।

हाँ, मैं जानता हूँ—
दुनिया की सारी उँगलियाँ बाहर की ओर मुड़ सकती हैं
पर मेरी अपनी उँगली काँपती है,
जब उसे खुद पर टिकाना पड़ता है।

क्या यही मेरा सच है?
मेरी आत्मा के नीचे छुपा वह गाढ़ा काला द्रव,
जहाँ हर गलती का हिसाब है,
पर मैं उसे छोटा कर देता हूँ,
दूसरों की भूलों को पर्वत बनाकर।

यह दोहरा चेहरा,
यह अजीब, अनाम, अतल अपराधबोध—
जो मेरे भीतर जलता रहता है,
एक धीमी आग की तरह।

मैं सोचता हूँ—
दुनिया बदतर नहीं है,
हमारे अंदर की वह छोटी-सी अंधी जगह है
जहाँ हम सत्य से मुड़ जाते हैं,
जहाँ आत्म-निरीक्षण सबसे बड़ी पराजय लगता है।

क्योंकि सच तो यह है—
कि दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाना सरल है,
पर खुद के भीतर उतरना,
सबसे क्रूर यात्रा है।

और वहीं कहीं,
मेरी मनुष्यता का हिसाब लिखा है…
जिसे पढ़ने से मैं सबसे ज़्यादा डरता हूँ।

महेंद्र "मजबूर"

इज्ज़त का सफर

 इज्ज़त का सफर



चलो निकलो बिना सहारे,

ख्वाबों को झोली में लेकर,

कुछ रास्ते तुम्हें रोकेंगे,

कुछ चल देंगे तुम्हारे संग होकर।


खाली जेब का हर सिक्का,

तजुर्बों से भर जाएगा,

जो झुककर हँसता है आज,

कल वही सिर उठाकर चमक जाएगा।


इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती,

पसीने से उगानी पड़ती है,

गिरने की भी एक कीमत होती है,

और उठने की भी कहानी पड़ती है।


कदम मुश्किल ज़रूर होंगे,

मगर मंज़िलें भी इंतज़ार में हैं,

हर संघर्ष में एक सबक है,

हर हार जीत की तैयार में है।


खाली हाथ से जो चल पड़े,

उसी ने दुनिया जीती है,

वहम छोड़ो—हक़ीक़त कहती है,

इज़्ज़त मेहनत से ही मिलती है।


महेंद्र 'मजबूर'

मजबूरी का तख्त

 हमें कभी मुकद्दस निगाहों से देखा ही नहीं गया,

हमारे भीतर की रोशनी को समझा ही नहीं गया।
हमने दिलों में महल बनाए, उम्मीदें सजाईं,
पर ज़माने ने हमें पैरों की ख़ाक समझा।

हम राजा थे अपने सपनों के, अपनी रूह के,
मगर हालातों ने हमें मजबूर सा लिख दिया।
किस्मत की लकीरों में ताक़त थी बहुत,
पर हाथों में ज़ंजीरों का वक़्त थमा रहा।

हम मुस्कुराए भी तो दर्द की कीमत देकर,
हम चले भी तो रेत पर काँटे रखकर।
शान छुपाकर भी सीना तान कर चलते रहे,
क्योंकि हक़ था हमारा—भले दुनिया ने न दिया।

हम मजदूर भी थे, हम ही शहंशाह भी,
बस अंतर इतना था—दुनिया ने हमें जाना नहीं।
हमारे भीतर जो आग थी, उसने हमेशा कहा—
राजा होना ताज पहनना नहीं, गिरकर भी खड़ा रहना है।

महेंद्र 'मजबूर'

आग का यात्री

 

आग का यात्री

मैंने बचपन खो दिया था—
किसी अदृश्य उद्घोष की तरह,
जहाँ मासूमियत का स्वर
समय की फटी किताबों में दबा पड़ा था।

फिर मैं गिरा—
मनुष्य की उस खोह में,
जहाँ छल है, धोखा है, पाखंड है,
और हर चेहरा एक मुखौटा,
हर हाथ पर झूठ की परतें।

यह जीवन नहीं—
एक भट्टी है,
जहाँ मैं स्वर्ण नहीं,
बल्कि आग में उलझा हुआ प्रश्न हूँ।

धधकता हुआ अहंकार—
कभी मुझे जला देता है,
कभी मुझे बुझा देता है,
पर मैं न पूर्ण राख हूँ
न पूर्ण ज्योति।

मैं धुआँ हूँ—
त्रिशंकु-सा लटका,
अधूरी मृत्यु के अँधेरे में।

क्योंकि ज्ञान एक ऐसा दंश है
जो लौटने नहीं देता,
अनुभव एक ऐसा सत्य
जो भुलाया नहीं जा सकता।

मैं समय के विरुद्ध नहीं,
पर उसके भीतर जूझ रहा हूँ—
उस नदी में जहाँ लौटना वर्जित है,
और आगे बढ़ना अनिवार्य।

हाँ, सोना निखरता है आग में,
पर हमेशा जलता रहे—
यह भी एक कैद है!

इसलिए मैं संघर्ष करता हूँ—
अपने भीतर के मनुष्य से,
अपनी ही राख से,
अपने ही अंधकार से।

एक दिन
यह आग मुझे मुक्त करेगी—
या तो मैं जलकर समाप्त हो जाऊँगा,
या स्वर्ण की अंतिम चमक में
अपने भीतर का सत्य पा लूँगा।

-महेंद्र 'मजबूर'

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अधूरी ज़िंदगी

 अधूरी ज़िंदगी 

ज़िंदगी, तू सच में हसीं है,
फूलों की महक, हवा की सरसराहट — सब तेरी है।
फिर भी…
जब वह पास नहीं,
तू अधूरी सी लगती है।

हर सुबह में तेरी रौशनी है,
हर शाम में तेरे रंग हैं,
फिर भी…
उसकी यादों के बिना,
तेरी खुशियाँ भी कुछ फीकी सी हैं।

मैं चलता हूँ तेरे रास्तों पर,
साँसें भरता हूँ तेरी हवा में,
फिर भी…
उसके बिना, मेरी ज़िंदगी
जैसे अधूरी कहानी सी है।

तेरी हँसी भी अधूरी है,
तेरी ख़ुशियाँ भी अधूरी हैं,
और मैं…
बस उसका इंतजार करता हूँ,
कि लौट आए, और तू पूरी सी लगे।

-महेंद्र 'मजबूर'

बाकी तो नहीं

मेरे दिल में तेरी यादों का कोई असर बचा बाकी तो नहीं,

तेरी मोहब्बत की राख में कोई चिन्ह जगा बाकी तो नहीं।

तेरे जाने से टूटी हर आस, हर ख्वाब अधूरा रहा,
इन ख़ामोशियों में कोई पुरानी दुआ बाकी तो नहीं।

तेरी आँखों की गहराई में मेरी साँसें खो गईं,
इस वीराने में कोई तेरी याद बसा बाकी तो नहीं।

हर दर्द मैंने अपने भीतर सहा और संभाला है,
इन अश्क़ों में कोई राहत छुपा बाकी तो नहीं।

तेरी हँसी की हल्की आहट आज भी दिल को छूती है,
इन पलकों में कोई रोशनी जगा बाकी तो नहीं।

हमने जो वादे कभी निभाने की ठानी थी,
इन फासलों में कोई निशां बचा बाकी तो नहीं।

आख़िरी बार पूछ लें दिल से ये सवाल,
तेरे बिना हमारे बीच मोहब्बत बचा बाकी तो नहीं।

तुम्हारे लौटने की राह अब भी वीरान है,
इन रास्तों में कोई ठंडी छाँव जगा बाकी तो नहीं।

जो खोया, उसे यादों में सावधानी से रखा है,
इन लम्हों में कोई ख़ुशी बसी बाकी तो नहीं।

तेरे बिना यह जीवन आधा और सुनसान लगता है,
इस दुनिया में कोई साया, कोई हमसफ़र बाकी तो नहीं।

यादों का सिलसिला अब भी धीरे चलता है,
इन रातों में कोई चिंगारी जगा बाकी तो नहीं।

मेरी तन्हाई अब सिर्फ़ तेरे नाम की गवाही देती है,
इन दीवारों में कोई आवाज़ बाकी तो नहीं।

तूने जो छोड़ दिया, वह दर्द अब तक मेरे साथ है,
इस बिखरे दिल में कोई राहत बची बाकी तो नहीं।

हर साँस में तेरी कमी गहरी तरह महसूस होती है,
इस जीवन में कोई राहत जगा बाकी तो नहीं।

और जब चाँद भी तन्हा आसमान में झिलमिलाता है,
इस दिल की खामोशी में कोई रोशनी बाकी तो नहीं।

महेंद्र "मजबूर"©️®️

प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

 प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

मेरे हृदय की अक्षरित संवेदना का
तुम ही परम-उद्गम हो,
अधरों पर ठिठकी व्याख्याओं की
अनुत्तरित प्रतिध्वनि हो तुम।

तुम ही समय की अनंत धारा में
अस्तित्व का शाश्वत अनुलेपन,
धड़कनों के अंतरालों में
प्रेम का पवित्रतम संलेपन।

तुम ही मौन की मर्मज्ञ व्याख्या,
निशब्दताओं का गहन शब्दार्थ,
तुम ही अंतरतम की वेदना में
स्पंदित सौंदर्य का अंतिम अर्थ।

जैसे नयनों में जमता रहा
भावों का अतल-संलयन,
तुम हो मेरे समस्त अनुभूतियों का
एकमात्र सूक्ष्म-संवेदन।

मेरे हृदय में परिभाषित प्रेम की
अदृश्य, अविनश्वर संरचना हो तुम—
तुम ही ध्येय, तुम ही सार,
प्रेम का दार्शनिक अनुवाद भी तुम। 

महेंद्र "मजबूर"©️®️

सोमवार, 10 नवंबर 2025

कागज़ की नाव

 

कागज़ की नाव 

हम सपनों में रचते रहे, कागज़ की वह नाव,
नदियों में खोजते रहे, जीवन का प्रवाह।

बचपन की धूप थी सरल, छांव में थी माया,
हर लहर में दिखती थी, जग की मीठी छाया।

पर जब प्रौढ़ता आई, बढ़ी लहरों की धुन,
भंवरों ने तोड़ दिए, वो नन्हे स्वप्न गुन।

मन के तट पर आज भी, बचपन का वह भाव,
कभी भिगो दे आँख को, कभी करे विलाप।

सीखा तब हमने यही — यही जग का मर्म,
निर्मल हृदय के गीतों में, छिपे जीवन के कर्म।

फिर भी भीतर कहीं वही, नन्ही नाव तिरती,
भंवरों से लड़ती हुई, मुस्कान लिए गिरती।

महेंद्र मजबूर 

नदी का तीर

 

नदी का तीर 

अब भी भाता है मुझे, वही नदी का तीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

नीरव था वन, झुकीं तरुवर की कोमल डालें,
लहरों में झलके थे नभ के सपनों के जाले।
मृदु पवन बही थी जैसे किसी का आह्वान,
और धरा ने ओढ़ लिया था संध्या का मान।

उस क्षण की हल्की मुस्कान, अधरों की लोरी,
बन गई हृदय में गूंजती, एक मधुर सिंधु-गोरी।
वह प्रथम वेदना, जो प्रेम से पहले आई,
आज भी स्मृति में वही दीपिका बन छाई।

समय की धारा बह गई, सब कुछ ले डोली,
पर मन के घाट न सूखे, वे पीड़ा की बोली।
अब भी जब संध्या ढले, सुनूं वही नीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

महेंद्र मजबूर 

तुम बनो प्रभात

 तुम बनो प्रभात


जब मन में छाए घने अंधियार,

टूटे सपनों का हो संसार,

तब तुम आना, बन किरण उजाल,

मन को देना नया खयाल।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब थम जाए जीवन की राह,

ना हो कोई अपना अथवा चाह,

तब तुम बन जाना मुस्कान,

भर देना फिर से अरमान।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब हर दिशा मौन हो जाए,

दिल में बस सन्नाटा छाए,

तब तुम गुनगुनाना धीरे,

सपनों को जगाना पीरे।।


तुम बनो प्रभात, अमर उजियारा,

जीवन हो फिर से प्यारा।

तुम बनो प्रभात…

तुम बनो प्रभात… 


 #महेंद्र मजबूर ©️®️

वो एक अधूरा गाना

वो एक अधूरा गाना

छूट गया कहीं वो पल सुहाना,
भुला दिया जो एक अफसाना,
पर दिल की गहराई में अब भी,
गूँज रहा है उसका तराना।
कोई खामोशी है भीतर बसी,
जो बोल नहीं, बस सुनती है,
हर सांस में उसकी हल्की-सी खुशबू,
अब भी धीमे से छनती है।
मैं धुन गुनगुनाता रहा उम्र भर,
वो गीत रहा अधूरा मगर,
हर सुर में उसकी याद मिली,
हर शब्द में उसका असर।
कहना चाहा कई दफ़ा,
पर लफ़्ज़ कहीं रुक जाते हैं,
कुछ एहसास बस जीए जाते हैं,
कभी ज़ुबां तक नहीं आते हैं।
अब जब भी रात उतरती है,
सन्नाटा गाता है वो गाना,
जो पूरा कभी न हो सका,
फिर भी दिल में है वो अफसाना।

#महेंद्र "मजबूर"

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

 

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

बाबा...
क्या मैं पराई हूँ...?
जब मैं पहली बार हँसी थी,
आपकी आँखों में जो चमक थी...
वो क्या कुछ बरसों की ही थी...?

जब आप मुझे कंधों पर बिठाकर कहते थे —
“मेरी गुड़िया, मेरी राजकुमारी...”
क्या उस राजकुमारी का राज
किसी और के घर में था, बाबा...?

जब मैं स्कूल से दौड़ती हुई आती थी,
आप कहते थे — "धीरे भाग बेटी!"
क्या उस वक़्त भी आप जानते थे
कि एक दिन मैं सच में... दूर चली जाऊँगी...?

बाबा...
जब मैं साड़ी पहनूँगी पहली बार,
आप नज़रें झुका लेंगे...?
या पलटकर देखेंगे भी नहीं...?

जब मैं विदा लूँगी...
क्या मेरे आँसुओं को
आप अपनी हथेलियों में समेट लेंगे,
या बस हवा में छोड़ देंगे...?
बाबा...
माँ कहती है, “लड़की का घर तो ससुराल होता है।”
तो ये घर क्या है, बाबा...?
जहाँ दीवारों पर मेरी हँसी है,
जहाँ मेरे पैरों की आहटें गूँजती हैं —
क्या ये सब मिट जाएगा...?

क्या मैं मिट जाऊँगी...?
जब कोई और कमरे में सोएगा,
जहाँ मैं गुड़ियों से बातें करती थी...
क्या वो गुड़िया भी चुप हो जाएँगी...?
बाबा...
क्या आप मेरे बाद कमरे का दरवाज़ा बंद कर देंगे...?
या रोज़ चुपचाप खोलेंगे,
बस यह देखने कि मैं लौट आई क्या...?

जब मैं किसी और घर में “बहू” बनूँगी,
किसी के लिए “माँ” बनूँगी...
तो मेरे भीतर जो “आपकी बेटी” है —
वो कहाँ जाएगी...?
कौन पुकारेगा मुझे वैसे —
“अरे बिटिया... आज फिर बाल उलझे हैं!”

बाबा...
क्या मैं सच में पराई हूँ...?
या ये दुनिया झूठ बोलती है...?
क्यों हर आँगन मुझे अपनाने से पहले
छोड़ने की तैयारी करता है...?

बाबा...
अगर सच में मैं पराई हूँ —
तो मेरा मन इतना अपनों सा क्यों धड़कता है...?
क्यों हर दर्द में आपका नाम निकलता है...?
बस एक बार...
बस एक बार कह दो बाबा —
कि मैं तुम्हारी थी...
तुम्हारी हूँ...
और तुम्हारी ही रहूँगी...

फिर चाहे यह दुनिया हज़ार बार कहे —
“लड़की तो पराई होती है...”

-महेंद्र "मजबूर "©️®️

विरह में जल की छाया

 

विरह में जल की छाया

आँखें —
जैसे किसी अनकहे क्षण का ठहरा हुआ जल।
कठोर?
शायद…
जैसे पत्थर में सोई हुई नमी।

श्मशान लौटकर
वे कुछ नहीं कहतीं —
बस राख की गंध
थोड़ी देर तक
मन के भीतर टिमटिमाती रहती है।

फिर सब शान्त।
जैसे मृत्यु भी थक गई हो।

पर जब
किसी भूले हुए स्पर्श की आहट
धीरे से छू जाती है —
तो भीतर कुछ रिसता है,
कोई शब्दहीन रोशनी
बह निकलती है —
धीरे…
बिलकुल वैसे,
जैसे बर्फ पिघलने पर
पानी भी रो नहीं पाता।

श्मशान की निष्ठुरता से नहीं,
प्रेम की अनुपस्थिति से टूटती हैं ये आँखें —
और फिर भी
वो टूटना ही शायद
उनका जीवित रहना है।

-महेंद्र "मजबूर"

माधव के बिना

 

माधव के बिना


अब भी गूंजता है रण का शंख,
पर उसमें कोई आस्था नहीं है।
धूल में लिपटे हुए रथों पर
कर्म का नहीं, केवल अहंकार का भार है।
और जहाँ माधव नहीं —
वहाँ समय भी रुक जाता है,
इतिहास भी मौन हो जाता है।

कर्ण!
तेरा दान व्यर्थ गया,
तेरी करुणा भी तेरे रथ के पहिए संग टूट गई।
द्रोण!
तेरा शिष्य तेरा संकल्प निगल गया,
ज्ञान की दीपशिखा लहू में बुझ गई।
दुर्योधन!
तेरा साम्राज्य तेरे ही क्रोध में डूब गया,
तेरा स्वप्न तेरे अहं से बड़ा था क्या?

क्योंकि जहाँ माधव नहीं,
वहाँ विजय का अर्थ नहीं होता।
वहाँ केवल एक निःशब्द पराजय होती है—
जिसे समय बार-बार दोहराता है।

और अर्जुन...
वह तो केवल एक निमित्त है,
जिसकी डोर माधव के हाथों में है।
उसकी आँखों में जो आँसू हैं,
वही सत्य हैं —
क्योंकि उनमें करुणा है, और करुणा ही धर्म है।

युद्ध समाप्त नहीं होता,
हर युग में जन्म लेता है।
हर मनुष्य के भीतर
एक कुरुक्षेत्र फिर से सजता है।
और हर बार—
जिनके हिस्से में माधव नहीं होते,
वे सब... हार जाते हैं।

-महेंद्र "मजबूर"

मौसमों के उस पार

 मौसमों के उस पार 


सुनो,

मैं नवंबर की गुनगुनी ठंड ले आया हूँ —

वह ठंड,

जो तुम्हारे शब्दों की तरह चुभती नहीं,

बस चुपचाप भीतर उतर जाती है।

मेरे हाथों में अभी भी धूप की आख़िरी गरमी है,

जो तुम्हारे नाम से पिघलती है,

और हर साँझ मुझसे पूछती है —

क्या वह आएगी?

तुम आना,

दिसंबर की लंबी रातों को साथ लेकर —

जहाँ तारे देर तक जागते हैं,

और मौन में भी कोई संगीत सुनाई देता है।

अपने संग लाना —

थोड़ी-सी गुलाबी धूप,

थोड़ी-सी उनींदी नींद,

और वो अधूरी मुस्कान

जो पिछली सर्दी में दरवाज़े पर रह गई थी।

क्योंकि देखो —

मौसम केवल बाहर नहीं बदलते,

वे भीतर भी उतरते हैं।

हर ठंड का एक स्पर्श होता है,

हर धूप का एक नाम।

मैं नवंबर हूँ —

क्षणिक, कोमल,

थोड़ी धूप, थोड़ी धुंध,

और बहुत-सी प्रतीक्षा लेकर।

और तुम दिसंबर हो —

गहरा, दीर्घ,

जिसकी रातें ठंड में भी तपती हैं

क्योंकि उनमें प्रेम जीवित है।

जब हम मिलेंगे —

तो शायद ऋतु नहीं,

समय रुक जाएगा;

धूप और ठंड एक हो जाएँगे,

जैसे प्रेम और विरह

एक ही साँस में जीते हों।


-महेंद्र मजबूर

रविवार, 9 नवंबर 2025

मुस्कान के पीछे का सन्नाटा

 

मुस्कान के पीछे का सन्नाटा

मेरी वेदनाएं सीमित हैं, मेरे अंतर्मन की दीवारों में,
जहाँ शब्द भी थक जाते हैं, आँसू छिप जाते हैं धारों में।

दुनिया तो बस चेहरा देखती है, हँसी में अर्थ तलाशती है,
पर दिल की दरारों की आवाज़ — किसे सुनाई पड़ती है?

हर सुबह मैं एक नया मुखौटा पहनता हूँ,
खुशी का रंग भरकर जीवन का अभिनय करता हूँ।

क्योंकि शिकवे दुनिया को समझ नहीं आते,
और दर्द यहाँ कमजोरी कहलाते हैं।

पर भीतर का तूफ़ान अब भी जागता है,
हर मुस्कान के पीछे एक सन्नाटा भागता है।

कभी सोचा है — ये चमकती आँखें क्यों नम हैं?
क्योंकि जो दिखता नहीं, वही सबसे गहरा ग़म है।

महेंद्र मजबूर 

मीरा की अंतिम पुकार

 "मीरा की अंतिम पुकार"


देखो ना माधव,

यह तेरी बनाई हुई दुनिया

अब मेरा इम्तिहान लेना चाहती है।

हर कोई कहता है —

तेरा नाम भूल जा,

पर यह नाम ही तो मेरी साँसों का अर्थ है।


माधव,


जो मेरे अपने हैं,

वही अब मुझसे डरते हैं —

कहते हैं, मीरा पागल हो गई है,

क्योंकि वह तुझसे प्रेम करती है

बिना भय, बिना संकोच।


राणा जी आए हैं — माधव... 


संग लाए हैं मेरे लिए जहर का प्याला।

कहते हैं,

अब तेरी भक्ति बस बहुत हुई।

पर मैं मुस्कुरा रही हूँ, माधव —

क्योंकि यह प्याला भी तो

तेरे नाम का प्रसाद है।

माधव,

उसमें भी

तेरा ही प्रतिबिंब झलकता है।

जहर?

नहीं…

यह तेरे मिलने की सीढ़ी है।

माधव,

मैं खुशी से पी लूंगी —

शायद मौत के बाद

तेरी बाँसुरी की ध्वनि सुनाई दे,

और मैं उसमें खो जाऊँ,

हमेशा के लिए। 


माधव…

क्या मैं तेरे लिए राधा जैसी प्रिय नहीं?


क्या मेरी भक्ति कम थी,

या मेरा प्रेम अधूरा था?


कब तक मेरी परीक्षा लोगे माधव?


कब तक मेरा हृदय राख बनता रहेगा

तेरे नाम के ताप में?


अब ये महल मुझे कैद लगते हैं,

हर दीवार जैसे फुसफुसाती है —


“मीरा, तू पागल है।”


हाँ माधव,

मैं पागल हूँ —

पर तेरे प्रेम में।

चित्तौड़गढ़ अब मुझे अच्छा नहीं लगता।

यहाँ की हवा भी

तेरे बिना भारी लगती है।

बताओ ना माधव,

मैं कहाँ जाऊँ?


कौन-सा वन है

जहाँ तेरे चरणों की धूल मिले?


माधव, सुनो…

यदि आज मैं यह विष पी लूँ,

तो समझना —

मीरा हार नहीं रही,

मीरा लौट रही है —

तेरे पास,

तेरे स्वर में,

तेरे मौन में। 


माधव…

अब मीरा नहीं बोलेगी,

अब बंसी बोलेगी —

और तेरे स्वर में

उसकी आत्मा गूँजेगी। 


("माधव का उत्तर : मीरा को")


मीरा...

अब प्याला तेरे हाथ में है,

पर जहर नहीं है उसमें —

वह तो मेरे मिलने की लहर है।


जिसे यह संसार “मृत्यु” कहता है,

वह तेरे लिए —

बस एक द्वार है,

जिसके उस पार मैं खड़ा हूँ,

मुस्कुराता हुआ।


मीरा,

तू पूछती थी —

“क्या मैं राधा जैसी प्रिय नहीं?”


राधा का प्रेम संध्या का गीत था,

तेरा प्रेम — भोर की ज्योति है।


राधा ने प्रेम किया,


पर तूने प्रेम को पूजा बना दिया।


तूने मुझे माँगा नहीं,

स्वयं को दे दिया।

मीरा,

तेरी हर पीड़ा

तेरे भीतर की ज्योति बन गई है।

यह जो लोग कहते हैं — तू पागल है,

उन्हें क्या पता,

जो प्रेम में डूबता है,

वह संसार के लिए खो जाता है,

पर सत्य में मिल जाता है।

मैं तेरे महलों की दीवारों में नहीं,

तेरे अंतर्मन की निस्तब्धता में हूँ।

जब तू जहर पीती है,

तब मैं तेरी नसों में बहता हूँ —

अमृत बनकर,

मुक्ति बनकर।

मीरा,

अब चित्तौड़ छोड़ दे,

यह किला नहीं, एक छाया है।

तेरा घर वहाँ है,

जहाँ कोई दीवार नहीं,

जहाँ तेरी प्रार्थना ही हवा है,

और मैं — तेरी हर साँस में।

मत रो मीरा…

तेरी हँसी में अब प्रकाश है।

अब तू शरीर नहीं,

संगीत है।

तेरी देह मिटेगी,

पर तेरी भक्ति —

युगों तक गूँजेगी। 


मीरा,

तू विष नहीं पी रही,

तू समय को पी रही है —

और इस क्षण से

तेरा नाम

मेरे नाम में विलीन हो गया है।


अब तू मैं हूँ,


और मैं —


तू। 


-महेंद्र 'मजबूर'©️®️

शनिवार, 8 नवंबर 2025

तमाशा हम ही थे

बस... दो ही किरदार लिखे थे उसने —

एक मैं,
एक तुम...
बाक़ी जो थे...
वो तो हवा के पन्नों पर लिक्खे हुए नाम थे,
जिन्हें वक़्त ने — बिना पढ़े — पलट दिया।

कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर हम... तमाशा न होते,
तो शायद...
मदारी होते।
लोगों को हँसाते,
उनकी आँखों से आँसू चुराते,
और कहते — "देखो,
ज़िंदगी कितनी आसान है!"

पर अब तो हाल ये है...
हम ही नाच रहे हैं,
अपने ही गीतों पर,
बिना ताल के... बिना साज़ के।
भीड़ हँसती है —
तालियाँ बजती हैं —
पर उस शोर के नीचे,
एक सन्नाटा साँस लेता है...
जो सिर्फ़ हमें सुनाई देता है।

लेखक...
शायद भूल गया था —
कहानी में किरदार नहीं,
साँसें भी चाहिए होती हैं।
हमने साँस ली...
और कहानी चल पड़ी।

बस...
वहीं से —
तमाशा शुरू हो गया।

-महेंद्र 'मजबूर'

सूरज का टुकड़ा

 सूरज का टुकड़ा गिरता है मेज़ पर,

मैं उसे छू लेता हूँ —
गरम नहीं होता अब,
बस जैसे किसी पुराने वादे की याद दिलाता हो।

दिन भर की थकान वहीं रखी है,
किताबों के नीचे,
कुछ सपने अधूरे,
कुछ चिट्ठियाँ जिन पर अब नाम नहीं लिखा।

खिड़की के पार
आसमान अपनी उम्र गिनता है,
और मैं —
अपनी।

कभी यही उजाला मेरे भीतर था,
माथे पर धूप की लकीर थी,
हाथों में दिशा थी,
और आँखों में आग।
अब वही धूप
धीरे-धीरे उतरती है मेज़ पर —
संकोच से,
जैसे कह रही हो,
“मैं अब भी तेरे साथ हूँ।”

मैं उसे छू लेता हूँ,
नरमी से,
क्योंकि डर है —
कहीं ये किरण भी नाराज़ न हो जाए
मेरी ख़ामोशी से।

उस पल लगता है,
कि अब भी कोई है —
जो लौट आता है
हर शाम के अंधेरे से पहले।

सूरज का टुकड़ा गिरता है मेज़ पर,
और मैं जान जाता हूँ —
ज़िंदगी पूरी नहीं सही,
पर अभी ख़त्म भी नहीं हुई।

महेंद्र मजबूर 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

ज़िंदगी की रिहर्सल

हर साँस में मौत की ख़ुशबू बसती है,

ज़िंदगी अब एक जनाज़े की रिहर्सल लगती है।

चेहरे पर हँसी है मगर दिल में वीरानी,
हर मुस्कान के पीछे कोई अधूरी कहानी।

रातें सवालों से भरी, नींद बेगानी,
हर सुबह लगे जैसे कोई अंतिम निशानी।

आसमान भी अब उतना नीला नहीं लगता,
उम्मीदों का सूरज भी ढलता दिखाई देता।

रिश्ते आईने हैं — टूटे, बिखरे, थके,
हर कदम पे ख़ामोशी के साये ढके।

अब तो बस साँसों का हिसाब चलता है,
जीना भी जैसे इंतज़ार-ए-मौत बनता है।

हर साँस में मौत की ख़ुशबू बसती है,
ज़िंदगी अब एक जनाज़े की रिहर्सल लगती है।

महेंद्र मजबूर 

मुक्ति की चाह


बदन की क़ैद से बाहर ठिकाना चाहता है,
अजीब दिल है, कहीं और जाना चाहता है।

जहाँ न कोई बंधन हो, न कोई दीवार,
बस ख़्वाब हों, और हवा में आज़ाद पुकार।

यह साँसें जैसे किसी ज़ंजीर में बंधी हैं,
हर धड़कन में कोई अदृश्य कैद छिपी है।

ज़िंदगी की राहें सब मंज़िलों तक जाती हैं,
पर मेरा मन तो बेनाम दिशाओं में खो जाता है।

शायद कोई आसमान होगा अपने ही भीतर,
जहाँ आत्मा खुद से मिलने को बेक़रार बैठी है।

बदन की क़ैद से बाहर ठिकाना चाहता है,
अजीब दिल है, कहीं और जाना चाहता है।

महेंद्र मजबूर 

बुधवार, 5 नवंबर 2025

लापता है ज़िंदगी

उलझनों की भीड़ में लापता है ज़िंदगी,

ख़ुद से ही रूठी हुई, ख़ामोश क्यों है ज़िंदगी?


आईनों में चेहरों के मेले लगे हैं आज,

पर कहीं पे अपनी सी, लगती नहीं है ज़िंदगी।


कदम थकते नहीं, पर राह रुक जाती है,

जाने किस तलाश में भागती है ज़िंदगी।


हँसी की ओट में छुपा है ग़म का समंदर,

चेहरे पे उजाला है, भीतर अँधेरा ज़िंदगी।


कभी ख़त बनके आई, कभी गीत बनके,

हर रूप में ढूँढी है, पर मिली नहीं ज़िंदगी।


और अब तो ये भी सवाल है मुझसे —

मैं जी रहा हूँ… या बस चल रही है ज़िंदगी? 


#महेंद्र 'मजबूर '©️®️

शनिवार, 1 नवंबर 2025

धर्मसंघर्ष


(शार्दूल विक्रीड़ित छंद — प्रत्येक पंक्ति लगभग २१ मात्राएँ)


धरा डोली रणभूमि गूँजी रणनाद।
धूल उड़ी नभ में फैला विलाप भी।

रथ पर पार्थ खड़ा मौन द्रष्टा नीरस,
कंपित कंठ पुकारे — “कृष्ण कठिन युद्ध!”

“यह मेरे पितामह, गुरु द्रोण महान,
इनसे ही पाया मैंने धर्म-ज्ञान।

बंधु सखा सब शस्त्र लिए सम्मुख खड़े,
कैसे करूँ संघर्ष, कहो माधव!”

मधुर मुसान लए बोले श्रीकृष्ण,
“यदि अपने हैं, तो रण क्यों यह विप्रसृत?”

“धर्म जहाँ है, वहीं स्वजन का स्थान,
मोह मिटा कर जानो सत्य विधान।

कर्तव्य तुम्हारा ही सच्चा धर्मपथ,
मोह न बाँध सके, यह ही समर-सत्य।”

पार्थ सुनाकर उठे दृढ़ तेज लिए,
गांडीव धरा पर ज्योति समान जले।

कृष्ण हँसे — “अब योग तुम्हारा जागा,
सत्य-पथी ही सखा, धर्म ही अनुरागा।”


महेंद्र 'मजबूर'


माया मोह का जाल

 


✍️ रचनाकार: महेंद्र मजबूर 

(1)
जग भ्रम में सब जी रहे, बोले “मेरा-तेरा”,
साँच कहे महेंद्र यह, कुछ भी नाहीं तेरा॥

(2)
माटी के घर में बसत, माटी तन का रूप,
आया खाली हाथ तू, जाएगा भी धूप॥

(3)
दिन दो पल का मेला यह, सबकी अपनी चाल,
कागज जैसे उड़ चले, टूटे हर जंजाल॥

(4)
माया के बंधन में जग, सब उलझा मुस्काय,
देख सच्चा जो रूप जब, मन भीतर हरषाय॥

(5)
धन दौलत कुल जात सब, सपनों के ही छंद,
जागे जो यह जान ले, सच्चा वही प्रचंड॥

(6)
ना राजा तू, ना भिखारी, ना तेरा पहचान,
बस एक यात्री मनुज है, चलता प्रभु के धाम॥

(7)
मन का मोह ही जाल है, इसमें जग उलझाय,
छोड़ अभिमान मोह सब, सच्चा सुख मिल जाय॥

(8)
साँस-साँस हरि नाम ले, मन से कर अरदास,
क्षण में यह जीवन ढले, जैसे जल की आस॥

(9)
लोभ, क्रोध तृष्णा त्यज, मत कर मन को भर,
जो भीतर दीपक जले, वही सच्चा सुंदर॥

(10)
सत्य प्रेम करुणा धर, त्यज दे अभिमान,
यही है जीवन सार तू, यही प्रभु का ज्ञान॥

(11)
जग में आया खेल कर, मत भूल प्रभु नाम,
महेंद्र कहे यही सिखा — सबमें एक ही राम॥