आग का यात्री
मैंने बचपन खो दिया था—
किसी अदृश्य उद्घोष की तरह,
जहाँ मासूमियत का स्वर
समय की फटी किताबों में दबा पड़ा था।
फिर मैं गिरा—
मनुष्य की उस खोह में,
जहाँ छल है, धोखा है, पाखंड है,
और हर चेहरा एक मुखौटा,
हर हाथ पर झूठ की परतें।
यह जीवन नहीं—
एक भट्टी है,
जहाँ मैं स्वर्ण नहीं,
बल्कि आग में उलझा हुआ प्रश्न हूँ।
धधकता हुआ अहंकार—
कभी मुझे जला देता है,
कभी मुझे बुझा देता है,
पर मैं न पूर्ण राख हूँ
न पूर्ण ज्योति।
मैं धुआँ हूँ—
त्रिशंकु-सा लटका,
अधूरी मृत्यु के अँधेरे में।
क्योंकि ज्ञान एक ऐसा दंश है
जो लौटने नहीं देता,
अनुभव एक ऐसा सत्य
जो भुलाया नहीं जा सकता।
मैं समय के विरुद्ध नहीं,
पर उसके भीतर जूझ रहा हूँ—
उस नदी में जहाँ लौटना वर्जित है,
और आगे बढ़ना अनिवार्य।
हाँ, सोना निखरता है आग में,
पर हमेशा जलता रहे—
यह भी एक कैद है!
इसलिए मैं संघर्ष करता हूँ—
अपने भीतर के मनुष्य से,
अपनी ही राख से,
अपने ही अंधकार से।
एक दिन
यह आग मुझे मुक्त करेगी—
या तो मैं जलकर समाप्त हो जाऊँगा,
या स्वर्ण की अंतिम चमक में
अपने भीतर का सत्य पा लूँगा।
-महेंद्र 'मजबूर'
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