इज्ज़त का सफर
चलो निकलो बिना सहारे,
ख्वाबों को झोली में लेकर,
कुछ रास्ते तुम्हें रोकेंगे,
कुछ चल देंगे तुम्हारे संग होकर।
खाली जेब का हर सिक्का,
तजुर्बों से भर जाएगा,
जो झुककर हँसता है आज,
कल वही सिर उठाकर चमक जाएगा।
इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती,
पसीने से उगानी पड़ती है,
गिरने की भी एक कीमत होती है,
और उठने की भी कहानी पड़ती है।
कदम मुश्किल ज़रूर होंगे,
मगर मंज़िलें भी इंतज़ार में हैं,
हर संघर्ष में एक सबक है,
हर हार जीत की तैयार में है।
खाली हाथ से जो चल पड़े,
उसी ने दुनिया जीती है,
वहम छोड़ो—हक़ीक़त कहती है,
इज़्ज़त मेहनत से ही मिलती है।
महेंद्र 'मजबूर'
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