कितना छोटा-सा प्रेम था तुम्हारा,
मानो किसी मौसम की घड़ी—
आया, ठहरा,
और कुछ ही पलों में लौट गया।
पर मेरा प्रेम…
वह किसी नदी की तरह है—
धीमी, लगातार बहती हुई,
चट्टानों से टकराकर भी
अपना स्वर नहीं खोती।
तुम्हारा स्नेह तो
थोड़ी-सी धूप जैसा था—
जिसे बादलों ने छुपा लिया।
मेरा प्रेम उस मिट्टी जैसा है
जो धूप-छाँव हर बार सहकर भी
अपनी खुशबू नहीं छोड़ती।
मैंने तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा—
शब्द खुद तुम्हारी ओर खिंचते चले आए।
अब ये पन्ने
मेरे जिये हुए दिनों की तरह
तुम्हारी छाया सँभाले बैठे हैं।
तुम रहो या न रहो,
मेरे भीतर एक धीमी-सी लौ जलती रहेगी,
जो प्रेम को कम नहीं होने देगी—
जो मेरे बाद भी कहेगी,
उसी शांत-सी करुण मुस्कान के साथ—
तुम हो… ना हो…
मेरा प्रेम तो रहेगा ही।
महेंद्र मजबूर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें