कागज़ की नाव
हम सपनों में रचते रहे, कागज़ की वह नाव,
नदियों में खोजते रहे, जीवन का प्रवाह।
बचपन की धूप थी सरल, छांव में थी माया,
हर लहर में दिखती थी, जग की मीठी छाया।
पर जब प्रौढ़ता आई, बढ़ी लहरों की धुन,
भंवरों ने तोड़ दिए, वो नन्हे स्वप्न गुन।
मन के तट पर आज भी, बचपन का वह भाव,
कभी भिगो दे आँख को, कभी करे विलाप।
सीखा तब हमने यही — यही जग का मर्म,
निर्मल हृदय के गीतों में, छिपे जीवन के कर्म।
फिर भी भीतर कहीं वही, नन्ही नाव तिरती,
भंवरों से लड़ती हुई, मुस्कान लिए गिरती।
महेंद्र मजबूर
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