उलझनों की भीड़ में लापता है ज़िंदगी,
ख़ुद से ही रूठी हुई, ख़ामोश क्यों है ज़िंदगी?
आईनों में चेहरों के मेले लगे हैं आज,
पर कहीं पे अपनी सी, लगती नहीं है ज़िंदगी।
कदम थकते नहीं, पर राह रुक जाती है,
जाने किस तलाश में भागती है ज़िंदगी।
हँसी की ओट में छुपा है ग़म का समंदर,
चेहरे पे उजाला है, भीतर अँधेरा ज़िंदगी।
कभी ख़त बनके आई, कभी गीत बनके,
हर रूप में ढूँढी है, पर मिली नहीं ज़िंदगी।
और अब तो ये भी सवाल है मुझसे —
मैं जी रहा हूँ… या बस चल रही है ज़िंदगी?
#महेंद्र 'मजबूर '©️®️
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