मौसमों के उस पार
सुनो,
मैं नवंबर की गुनगुनी ठंड ले आया हूँ —
वह ठंड,
जो तुम्हारे शब्दों की तरह चुभती नहीं,
बस चुपचाप भीतर उतर जाती है।
मेरे हाथों में अभी भी धूप की आख़िरी गरमी है,
जो तुम्हारे नाम से पिघलती है,
और हर साँझ मुझसे पूछती है —
क्या वह आएगी?
तुम आना,
दिसंबर की लंबी रातों को साथ लेकर —
जहाँ तारे देर तक जागते हैं,
और मौन में भी कोई संगीत सुनाई देता है।
अपने संग लाना —
थोड़ी-सी गुलाबी धूप,
थोड़ी-सी उनींदी नींद,
और वो अधूरी मुस्कान
जो पिछली सर्दी में दरवाज़े पर रह गई थी।
क्योंकि देखो —
मौसम केवल बाहर नहीं बदलते,
वे भीतर भी उतरते हैं।
हर ठंड का एक स्पर्श होता है,
हर धूप का एक नाम।
मैं नवंबर हूँ —
क्षणिक, कोमल,
थोड़ी धूप, थोड़ी धुंध,
और बहुत-सी प्रतीक्षा लेकर।
और तुम दिसंबर हो —
गहरा, दीर्घ,
जिसकी रातें ठंड में भी तपती हैं
क्योंकि उनमें प्रेम जीवित है।
जब हम मिलेंगे —
तो शायद ऋतु नहीं,
समय रुक जाएगा;
धूप और ठंड एक हो जाएँगे,
जैसे प्रेम और विरह
एक ही साँस में जीते हों।
-महेंद्र मजबूर
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