सोमवार, 10 नवंबर 2025

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

 

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

बाबा...
क्या मैं पराई हूँ...?
जब मैं पहली बार हँसी थी,
आपकी आँखों में जो चमक थी...
वो क्या कुछ बरसों की ही थी...?

जब आप मुझे कंधों पर बिठाकर कहते थे —
“मेरी गुड़िया, मेरी राजकुमारी...”
क्या उस राजकुमारी का राज
किसी और के घर में था, बाबा...?

जब मैं स्कूल से दौड़ती हुई आती थी,
आप कहते थे — "धीरे भाग बेटी!"
क्या उस वक़्त भी आप जानते थे
कि एक दिन मैं सच में... दूर चली जाऊँगी...?

बाबा...
जब मैं साड़ी पहनूँगी पहली बार,
आप नज़रें झुका लेंगे...?
या पलटकर देखेंगे भी नहीं...?

जब मैं विदा लूँगी...
क्या मेरे आँसुओं को
आप अपनी हथेलियों में समेट लेंगे,
या बस हवा में छोड़ देंगे...?
बाबा...
माँ कहती है, “लड़की का घर तो ससुराल होता है।”
तो ये घर क्या है, बाबा...?
जहाँ दीवारों पर मेरी हँसी है,
जहाँ मेरे पैरों की आहटें गूँजती हैं —
क्या ये सब मिट जाएगा...?

क्या मैं मिट जाऊँगी...?
जब कोई और कमरे में सोएगा,
जहाँ मैं गुड़ियों से बातें करती थी...
क्या वो गुड़िया भी चुप हो जाएँगी...?
बाबा...
क्या आप मेरे बाद कमरे का दरवाज़ा बंद कर देंगे...?
या रोज़ चुपचाप खोलेंगे,
बस यह देखने कि मैं लौट आई क्या...?

जब मैं किसी और घर में “बहू” बनूँगी,
किसी के लिए “माँ” बनूँगी...
तो मेरे भीतर जो “आपकी बेटी” है —
वो कहाँ जाएगी...?
कौन पुकारेगा मुझे वैसे —
“अरे बिटिया... आज फिर बाल उलझे हैं!”

बाबा...
क्या मैं सच में पराई हूँ...?
या ये दुनिया झूठ बोलती है...?
क्यों हर आँगन मुझे अपनाने से पहले
छोड़ने की तैयारी करता है...?

बाबा...
अगर सच में मैं पराई हूँ —
तो मेरा मन इतना अपनों सा क्यों धड़कता है...?
क्यों हर दर्द में आपका नाम निकलता है...?
बस एक बार...
बस एक बार कह दो बाबा —
कि मैं तुम्हारी थी...
तुम्हारी हूँ...
और तुम्हारी ही रहूँगी...

फिर चाहे यह दुनिया हज़ार बार कहे —
“लड़की तो पराई होती है...”

-महेंद्र "मजबूर "©️®️

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