सोमवार, 10 नवंबर 2025

माधव के बिना

 

माधव के बिना


अब भी गूंजता है रण का शंख,
पर उसमें कोई आस्था नहीं है।
धूल में लिपटे हुए रथों पर
कर्म का नहीं, केवल अहंकार का भार है।
और जहाँ माधव नहीं —
वहाँ समय भी रुक जाता है,
इतिहास भी मौन हो जाता है।

कर्ण!
तेरा दान व्यर्थ गया,
तेरी करुणा भी तेरे रथ के पहिए संग टूट गई।
द्रोण!
तेरा शिष्य तेरा संकल्प निगल गया,
ज्ञान की दीपशिखा लहू में बुझ गई।
दुर्योधन!
तेरा साम्राज्य तेरे ही क्रोध में डूब गया,
तेरा स्वप्न तेरे अहं से बड़ा था क्या?

क्योंकि जहाँ माधव नहीं,
वहाँ विजय का अर्थ नहीं होता।
वहाँ केवल एक निःशब्द पराजय होती है—
जिसे समय बार-बार दोहराता है।

और अर्जुन...
वह तो केवल एक निमित्त है,
जिसकी डोर माधव के हाथों में है।
उसकी आँखों में जो आँसू हैं,
वही सत्य हैं —
क्योंकि उनमें करुणा है, और करुणा ही धर्म है।

युद्ध समाप्त नहीं होता,
हर युग में जन्म लेता है।
हर मनुष्य के भीतर
एक कुरुक्षेत्र फिर से सजता है।
और हर बार—
जिनके हिस्से में माधव नहीं होते,
वे सब... हार जाते हैं।

-महेंद्र "मजबूर"

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