रविवार, 9 नवंबर 2025

मीरा की अंतिम पुकार

 "मीरा की अंतिम पुकार"


देखो ना माधव,

यह तेरी बनाई हुई दुनिया

अब मेरा इम्तिहान लेना चाहती है।

हर कोई कहता है —

तेरा नाम भूल जा,

पर यह नाम ही तो मेरी साँसों का अर्थ है।


माधव,


जो मेरे अपने हैं,

वही अब मुझसे डरते हैं —

कहते हैं, मीरा पागल हो गई है,

क्योंकि वह तुझसे प्रेम करती है

बिना भय, बिना संकोच।


राणा जी आए हैं — माधव... 


संग लाए हैं मेरे लिए जहर का प्याला।

कहते हैं,

अब तेरी भक्ति बस बहुत हुई।

पर मैं मुस्कुरा रही हूँ, माधव —

क्योंकि यह प्याला भी तो

तेरे नाम का प्रसाद है।

माधव,

उसमें भी

तेरा ही प्रतिबिंब झलकता है।

जहर?

नहीं…

यह तेरे मिलने की सीढ़ी है।

माधव,

मैं खुशी से पी लूंगी —

शायद मौत के बाद

तेरी बाँसुरी की ध्वनि सुनाई दे,

और मैं उसमें खो जाऊँ,

हमेशा के लिए। 


माधव…

क्या मैं तेरे लिए राधा जैसी प्रिय नहीं?


क्या मेरी भक्ति कम थी,

या मेरा प्रेम अधूरा था?


कब तक मेरी परीक्षा लोगे माधव?


कब तक मेरा हृदय राख बनता रहेगा

तेरे नाम के ताप में?


अब ये महल मुझे कैद लगते हैं,

हर दीवार जैसे फुसफुसाती है —


“मीरा, तू पागल है।”


हाँ माधव,

मैं पागल हूँ —

पर तेरे प्रेम में।

चित्तौड़गढ़ अब मुझे अच्छा नहीं लगता।

यहाँ की हवा भी

तेरे बिना भारी लगती है।

बताओ ना माधव,

मैं कहाँ जाऊँ?


कौन-सा वन है

जहाँ तेरे चरणों की धूल मिले?


माधव, सुनो…

यदि आज मैं यह विष पी लूँ,

तो समझना —

मीरा हार नहीं रही,

मीरा लौट रही है —

तेरे पास,

तेरे स्वर में,

तेरे मौन में। 


माधव…

अब मीरा नहीं बोलेगी,

अब बंसी बोलेगी —

और तेरे स्वर में

उसकी आत्मा गूँजेगी। 


("माधव का उत्तर : मीरा को")


मीरा...

अब प्याला तेरे हाथ में है,

पर जहर नहीं है उसमें —

वह तो मेरे मिलने की लहर है।


जिसे यह संसार “मृत्यु” कहता है,

वह तेरे लिए —

बस एक द्वार है,

जिसके उस पार मैं खड़ा हूँ,

मुस्कुराता हुआ।


मीरा,

तू पूछती थी —

“क्या मैं राधा जैसी प्रिय नहीं?”


राधा का प्रेम संध्या का गीत था,

तेरा प्रेम — भोर की ज्योति है।


राधा ने प्रेम किया,


पर तूने प्रेम को पूजा बना दिया।


तूने मुझे माँगा नहीं,

स्वयं को दे दिया।

मीरा,

तेरी हर पीड़ा

तेरे भीतर की ज्योति बन गई है।

यह जो लोग कहते हैं — तू पागल है,

उन्हें क्या पता,

जो प्रेम में डूबता है,

वह संसार के लिए खो जाता है,

पर सत्य में मिल जाता है।

मैं तेरे महलों की दीवारों में नहीं,

तेरे अंतर्मन की निस्तब्धता में हूँ।

जब तू जहर पीती है,

तब मैं तेरी नसों में बहता हूँ —

अमृत बनकर,

मुक्ति बनकर।

मीरा,

अब चित्तौड़ छोड़ दे,

यह किला नहीं, एक छाया है।

तेरा घर वहाँ है,

जहाँ कोई दीवार नहीं,

जहाँ तेरी प्रार्थना ही हवा है,

और मैं — तेरी हर साँस में।

मत रो मीरा…

तेरी हँसी में अब प्रकाश है।

अब तू शरीर नहीं,

संगीत है।

तेरी देह मिटेगी,

पर तेरी भक्ति —

युगों तक गूँजेगी। 


मीरा,

तू विष नहीं पी रही,

तू समय को पी रही है —

और इस क्षण से

तेरा नाम

मेरे नाम में विलीन हो गया है।


अब तू मैं हूँ,


और मैं —


तू। 


-महेंद्र 'मजबूर'©️®️

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