विरह में जल की छाया
आँखें —
जैसे किसी अनकहे क्षण का ठहरा हुआ जल।
कठोर?
शायद…
जैसे पत्थर में सोई हुई नमी।
श्मशान लौटकर
वे कुछ नहीं कहतीं —
बस राख की गंध
थोड़ी देर तक
मन के भीतर टिमटिमाती रहती है।
फिर सब शान्त।
जैसे मृत्यु भी थक गई हो।
पर जब
किसी भूले हुए स्पर्श की आहट
धीरे से छू जाती है —
तो भीतर कुछ रिसता है,
कोई शब्दहीन रोशनी
बह निकलती है —
धीरे…
बिलकुल वैसे,
जैसे बर्फ पिघलने पर
पानी भी रो नहीं पाता।
श्मशान की निष्ठुरता से नहीं,
प्रेम की अनुपस्थिति से टूटती हैं ये आँखें —
और फिर भी
वो टूटना ही शायद
उनका जीवित रहना है।
-महेंद्र "मजबूर"
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