वो एक अधूरा गाना
छूट गया कहीं वो पल सुहाना,
भुला दिया जो एक अफसाना,
पर दिल की गहराई में अब भी,
गूँज रहा है उसका तराना।
कोई खामोशी है भीतर बसी,
जो बोल नहीं, बस सुनती है,
हर सांस में उसकी हल्की-सी खुशबू,
अब भी धीमे से छनती है।
मैं धुन गुनगुनाता रहा उम्र भर,
वो गीत रहा अधूरा मगर,
हर सुर में उसकी याद मिली,
हर शब्द में उसका असर।
कहना चाहा कई दफ़ा,
पर लफ़्ज़ कहीं रुक जाते हैं,
कुछ एहसास बस जीए जाते हैं,
कभी ज़ुबां तक नहीं आते हैं।
अब जब भी रात उतरती है,
सन्नाटा गाता है वो गाना,
जो पूरा कभी न हो सका,
फिर भी दिल में है वो अफसाना।
#महेंद्र "मजबूर"
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