शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

ज़िंदगी की रिहर्सल

हर साँस में मौत की ख़ुशबू बसती है,

ज़िंदगी अब एक जनाज़े की रिहर्सल लगती है।

चेहरे पर हँसी है मगर दिल में वीरानी,
हर मुस्कान के पीछे कोई अधूरी कहानी।

रातें सवालों से भरी, नींद बेगानी,
हर सुबह लगे जैसे कोई अंतिम निशानी।

आसमान भी अब उतना नीला नहीं लगता,
उम्मीदों का सूरज भी ढलता दिखाई देता।

रिश्ते आईने हैं — टूटे, बिखरे, थके,
हर कदम पे ख़ामोशी के साये ढके।

अब तो बस साँसों का हिसाब चलता है,
जीना भी जैसे इंतज़ार-ए-मौत बनता है।

हर साँस में मौत की ख़ुशबू बसती है,
ज़िंदगी अब एक जनाज़े की रिहर्सल लगती है।

महेंद्र मजबूर 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें