शनिवार, 8 नवंबर 2025

सूरज का टुकड़ा

 सूरज का टुकड़ा गिरता है मेज़ पर,

मैं उसे छू लेता हूँ —
गरम नहीं होता अब,
बस जैसे किसी पुराने वादे की याद दिलाता हो।

दिन भर की थकान वहीं रखी है,
किताबों के नीचे,
कुछ सपने अधूरे,
कुछ चिट्ठियाँ जिन पर अब नाम नहीं लिखा।

खिड़की के पार
आसमान अपनी उम्र गिनता है,
और मैं —
अपनी।

कभी यही उजाला मेरे भीतर था,
माथे पर धूप की लकीर थी,
हाथों में दिशा थी,
और आँखों में आग।
अब वही धूप
धीरे-धीरे उतरती है मेज़ पर —
संकोच से,
जैसे कह रही हो,
“मैं अब भी तेरे साथ हूँ।”

मैं उसे छू लेता हूँ,
नरमी से,
क्योंकि डर है —
कहीं ये किरण भी नाराज़ न हो जाए
मेरी ख़ामोशी से।

उस पल लगता है,
कि अब भी कोई है —
जो लौट आता है
हर शाम के अंधेरे से पहले।

सूरज का टुकड़ा गिरता है मेज़ पर,
और मैं जान जाता हूँ —
ज़िंदगी पूरी नहीं सही,
पर अभी ख़त्म भी नहीं हुई।

महेंद्र मजबूर 

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