बदन की क़ैद से बाहर ठिकाना चाहता है,
अजीब दिल है, कहीं और जाना चाहता है।
जहाँ न कोई बंधन हो, न कोई दीवार,
बस ख़्वाब हों, और हवा में आज़ाद पुकार।
यह साँसें जैसे किसी ज़ंजीर में बंधी हैं,
हर धड़कन में कोई अदृश्य कैद छिपी है।
ज़िंदगी की राहें सब मंज़िलों तक जाती हैं,
पर मेरा मन तो बेनाम दिशाओं में खो जाता है।
शायद कोई आसमान होगा अपने ही भीतर,
जहाँ आत्मा खुद से मिलने को बेक़रार बैठी है।
बदन की क़ैद से बाहर ठिकाना चाहता है,
अजीब दिल है, कहीं और जाना चाहता है।
महेंद्र मजबूर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें