प्रेम का दार्शनिक अनुवाद
मेरे हृदय की अक्षरित संवेदना का
तुम ही परम-उद्गम हो,
अधरों पर ठिठकी व्याख्याओं की
अनुत्तरित प्रतिध्वनि हो तुम।
तुम ही समय की अनंत धारा में
अस्तित्व का शाश्वत अनुलेपन,
धड़कनों के अंतरालों में
प्रेम का पवित्रतम संलेपन।
तुम ही मौन की मर्मज्ञ व्याख्या,
निशब्दताओं का गहन शब्दार्थ,
तुम ही अंतरतम की वेदना में
स्पंदित सौंदर्य का अंतिम अर्थ।
जैसे नयनों में जमता रहा
भावों का अतल-संलयन,
तुम हो मेरे समस्त अनुभूतियों का
एकमात्र सूक्ष्म-संवेदन।
मेरे हृदय में परिभाषित प्रेम की
अदृश्य, अविनश्वर संरचना हो तुम—
तुम ही ध्येय, तुम ही सार,
प्रेम का दार्शनिक अनुवाद भी तुम।
महेंद्र "मजबूर"©️®️
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें