नदी का तीर
अब भी भाता है मुझे, वही नदी का तीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।
नीरव था वन, झुकीं तरुवर की कोमल डालें,
लहरों में झलके थे नभ के सपनों के जाले।
मृदु पवन बही थी जैसे किसी का आह्वान,
और धरा ने ओढ़ लिया था संध्या का मान।
उस क्षण की हल्की मुस्कान, अधरों की लोरी,
बन गई हृदय में गूंजती, एक मधुर सिंधु-गोरी।
वह प्रथम वेदना, जो प्रेम से पहले आई,
आज भी स्मृति में वही दीपिका बन छाई।
समय की धारा बह गई, सब कुछ ले डोली,
पर मन के घाट न सूखे, वे पीड़ा की बोली।
अब भी जब संध्या ढले, सुनूं वही नीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।
महेंद्र मजबूर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें