मैं देखता हूँ—
दूसरों की कमियों का विराट जंगल,
जहाँ दोषों की लतरें साँप-सी फुफकारती हैं,
और मैं, एक शिकारी की तरह,
निशाने साधता हूँ हर अँधेरे पर।
पर अचानक—
मेरे भीतर की नंगी दीवारें हिलने लगती हैं,
मेरे ही मन की दरारों से
किसी गहरे अपराध की गंध उठती है।
हाँ, मैं जानता हूँ—
दुनिया की सारी उँगलियाँ बाहर की ओर मुड़ सकती हैं
पर मेरी अपनी उँगली काँपती है,
जब उसे खुद पर टिकाना पड़ता है।
क्या यही मेरा सच है?
मेरी आत्मा के नीचे छुपा वह गाढ़ा काला द्रव,
जहाँ हर गलती का हिसाब है,
पर मैं उसे छोटा कर देता हूँ,
दूसरों की भूलों को पर्वत बनाकर।
यह दोहरा चेहरा,
यह अजीब, अनाम, अतल अपराधबोध—
जो मेरे भीतर जलता रहता है,
एक धीमी आग की तरह।
मैं सोचता हूँ—
दुनिया बदतर नहीं है,
हमारे अंदर की वह छोटी-सी अंधी जगह है
जहाँ हम सत्य से मुड़ जाते हैं,
जहाँ आत्म-निरीक्षण सबसे बड़ी पराजय लगता है।
क्योंकि सच तो यह है—
कि दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाना सरल है,
पर खुद के भीतर उतरना,
सबसे क्रूर यात्रा है।
और वहीं कहीं,
मेरी मनुष्यता का हिसाब लिखा है…
जिसे पढ़ने से मैं सबसे ज़्यादा डरता हूँ।
महेंद्र "मजबूर"
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