मुस्कान के पीछे का सन्नाटा
मेरी वेदनाएं सीमित हैं, मेरे अंतर्मन की दीवारों में,
जहाँ शब्द भी थक जाते हैं, आँसू छिप जाते हैं धारों में।
दुनिया तो बस चेहरा देखती है, हँसी में अर्थ तलाशती है,
पर दिल की दरारों की आवाज़ — किसे सुनाई पड़ती है?
हर सुबह मैं एक नया मुखौटा पहनता हूँ,
खुशी का रंग भरकर जीवन का अभिनय करता हूँ।
क्योंकि शिकवे दुनिया को समझ नहीं आते,
और दर्द यहाँ कमजोरी कहलाते हैं।
पर भीतर का तूफ़ान अब भी जागता है,
हर मुस्कान के पीछे एक सन्नाटा भागता है।
कभी सोचा है — ये चमकती आँखें क्यों नम हैं?
क्योंकि जो दिखता नहीं, वही सबसे गहरा ग़म है।
महेंद्र मजबूर
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