शनिवार, 8 नवंबर 2025

तमाशा हम ही थे

बस... दो ही किरदार लिखे थे उसने —

एक मैं,
एक तुम...
बाक़ी जो थे...
वो तो हवा के पन्नों पर लिक्खे हुए नाम थे,
जिन्हें वक़्त ने — बिना पढ़े — पलट दिया।

कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर हम... तमाशा न होते,
तो शायद...
मदारी होते।
लोगों को हँसाते,
उनकी आँखों से आँसू चुराते,
और कहते — "देखो,
ज़िंदगी कितनी आसान है!"

पर अब तो हाल ये है...
हम ही नाच रहे हैं,
अपने ही गीतों पर,
बिना ताल के... बिना साज़ के।
भीड़ हँसती है —
तालियाँ बजती हैं —
पर उस शोर के नीचे,
एक सन्नाटा साँस लेता है...
जो सिर्फ़ हमें सुनाई देता है।

लेखक...
शायद भूल गया था —
कहानी में किरदार नहीं,
साँसें भी चाहिए होती हैं।
हमने साँस ली...
और कहानी चल पड़ी।

बस...
वहीं से —
तमाशा शुरू हो गया।

-महेंद्र 'मजबूर'

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