(शार्दूल विक्रीड़ित छंद — प्रत्येक पंक्ति लगभग २१ मात्राएँ)
धरा डोली रणभूमि गूँजी रणनाद।
धूल उड़ी नभ में फैला विलाप भी।
रथ पर पार्थ खड़ा मौन द्रष्टा नीरस,
कंपित कंठ पुकारे — “कृष्ण कठिन युद्ध!”
“यह मेरे पितामह, गुरु द्रोण महान,
इनसे ही पाया मैंने धर्म-ज्ञान।
बंधु सखा सब शस्त्र लिए सम्मुख खड़े,
कैसे करूँ संघर्ष, कहो माधव!”
मधुर मुसान लए बोले श्रीकृष्ण,
“यदि अपने हैं, तो रण क्यों यह विप्रसृत?”
“धर्म जहाँ है, वहीं स्वजन का स्थान,
मोह मिटा कर जानो सत्य विधान।
कर्तव्य तुम्हारा ही सच्चा धर्मपथ,
मोह न बाँध सके, यह ही समर-सत्य।”
पार्थ सुनाकर उठे दृढ़ तेज लिए,
गांडीव धरा पर ज्योति समान जले।
कृष्ण हँसे — “अब योग तुम्हारा जागा,
सत्य-पथी ही सखा, धर्म ही अनुरागा।”
महेंद्र 'मजबूर'
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