शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अधूरी ज़िंदगी

 अधूरी ज़िंदगी 

ज़िंदगी, तू सच में हसीं है,
फूलों की महक, हवा की सरसराहट — सब तेरी है।
फिर भी…
जब वह पास नहीं,
तू अधूरी सी लगती है।

हर सुबह में तेरी रौशनी है,
हर शाम में तेरे रंग हैं,
फिर भी…
उसकी यादों के बिना,
तेरी खुशियाँ भी कुछ फीकी सी हैं।

मैं चलता हूँ तेरे रास्तों पर,
साँसें भरता हूँ तेरी हवा में,
फिर भी…
उसके बिना, मेरी ज़िंदगी
जैसे अधूरी कहानी सी है।

तेरी हँसी भी अधूरी है,
तेरी ख़ुशियाँ भी अधूरी हैं,
और मैं…
बस उसका इंतजार करता हूँ,
कि लौट आए, और तू पूरी सी लगे।

-महेंद्र 'मजबूर'

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