विरासत अब बेटी की
हालातों की धूल में दबी थी दिल की मजबूरी,
सदियों से सुनते आए थे— विरासत बेटे से पूरी।
पर एक दिन आँसूओं ने सवाल ये पूछ लिया,
क्या नाम के बिना भी कोई रिश्ता अधूरा रहा?
बेटियाँ आशाओं की ज्योत, सपनों की रखवाली,
वे ही संभालती हैं घर-आँगन की हर दीवारी।
कंधों पर जिम्मेदारियों की अनगिनत परतें,
फिर भी दुनिया बेटों को ही बताती रही, ज़रूरतें।
बाप के सीने से लग रो पड़ीं वो मासूम बाँहें,
कह गईं— हम भी तो तेरी साँसों की ही चाहें!
वक़्त ने भी सोचा— अब ये फैसले बदलेंगे,
विरासत के मायने कल की पीढ़ी गढ़ेंगे।
नाम से नहीं, कर्मों से पहचानें बनती हैं,
घर की नींवों में बेटियाँ भी शामिल रहती हैं।
अब कौन रोकेगा? दीवारें ढहने लगी हैं,
विरासत की कुंजी बेटियाँ गढ़ने लगी हैं।
- महेंद्र 'मजबूर'©️®️
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