मित्रवर, सुनो, एक कथा है निराली,
दिन में आई नींद, सपनों की लहरें मतवाली।
जहाँ पंछी बिना भेद उड़ते थे गगन में,
न कोई जात, न कोई धर्म था उनके मन में।
फूलों में सौंधापन, हवाओं में गीत,
झरनों के संग बजता प्रेम का संगीत।
हर चेहरे पे मुस्कान थी बसी,
न कोई दर्द, न कोई कमी थी किसी।
पर तभी खुली आँख, सपना टूट गया,
वो निर्मल जग कहीं पीछे छूट गया।
सामने फिर वही ज़मीन थी बंजर,
जहाँ दिलों में दीवारें थीं गहरी, अंदर।
सोचा — अगर परिंदों में भी होती हमारी सी आग,
तो आसमान भी लाल हो गया होता आज।
वाह रे खुदा, तेरी लीला निराली,
तूने इंसान बनाया — पर दी दुनिया बेहाली।
महेंद्र "मजबूर"
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