अक्तूबर उतर आया है —
धीरे, बिना शोर।
हवा में ठंड है,
पर मन में उससे गहरी सिहरन।
छत से गिरती हर बूँद
जैसे समय का प्रश्न है —
कब तक?
कहाँ तक?
किस ओर?
कमरे की दीवारें —
अब सिर्फ ईंट नहीं,
मेरे भीतर की थकान का चेहरा हैं।
कभी लगता है,
मैं अपने ही जीवन का किनारा हूँ —
जहाँ लहरें आती हैं,
पर ठहरती नहीं।
बच्चों की आँखों में
एक नन्हा विश्वास झिलमिलाता है,
पत्नी की दृष्टि में
निःशब्द प्रश्न —
“अब क्या होगा?”
और मैं...
इतना थक चुका हूँ
कि अपने ही उत्तर से डर लगता है।
सपनों की राख में
अब भी कोई अंगारा बचा है —
पर क्या वह जल पाएगा
इस अनिश्चित हवा में?
बाहर वर्षा गिर रही है —
पर भीतर
सिर्फ मैं हूँ,
भीगा हुआ,
बिना किसी छतरी के।
कभी-कभी सोचता हूँ —
क्या यही जीवन है?
या यह किसी और जीवन की प्रतीक्षा है
जो अभी तक जन्म नहीं लिया।
और तभी,
कहीं बहुत भीतर
एक धीमी आवाज़ आती है —
“चलो,
बस एक साँस और,
शायद वहीं से
नया आरंभ शुरू हो।”
✍महेंद्र 'मजबूर' ©️®️
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