बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ

धुंधली सी स्मृति में झिलमिल रेखा —

स्वप्नों के वन में वह एक देखा।

तुम चल दिए जब नभ के पार,

छूट गया मेरा संपूर्ण संसार।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

अश्रु न थे — बस धुंधलका था,

शब्द न थे — केवल कंपन था।

मन की वीणा टूटी सी पड़ी,

सुर तुम थे, मैं केवल लड़ी।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

तुम गए जहाँ, वहाँ आलोक,

मैं रह गई छाया की शोक।

प्रेम था तुममें — था मुझमें भी,

फिर यह विभाजन क्यों जीवन में ही?

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

साँसों में अब भी वह गंध बसी,

जिससे तुम्हारी राह हँसी।

पर अब वह पथ मौन पड़ा,

ज्यों दीपक बिन तेल झड़ा।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

तुम्हारा वन, मेरा एकांत,

दोनों एक ही तप का प्रांत।

तुम धर्म थे, मैं प्रेम रही,

दो धाराएँ, एक से बही।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

अब जब भी चाँदनी झरती है,

मन की वीणा फिर भरती है।

छू जाती हूँ तुम्हारा नाम,

वह बन जाता है ध्यान, प्रणाम।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

✍#महेंद्र मजबूर ©️®️

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