धुंधली सी स्मृति में झिलमिल रेखा —
स्वप्नों के वन में वह एक देखा।
तुम चल दिए जब नभ के पार,
छूट गया मेरा संपूर्ण संसार।
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
अश्रु न थे — बस धुंधलका था,
शब्द न थे — केवल कंपन था।
मन की वीणा टूटी सी पड़ी,
सुर तुम थे, मैं केवल लड़ी।
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
तुम गए जहाँ, वहाँ आलोक,
मैं रह गई छाया की शोक।
प्रेम था तुममें — था मुझमें भी,
फिर यह विभाजन क्यों जीवन में ही?
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
साँसों में अब भी वह गंध बसी,
जिससे तुम्हारी राह हँसी।
पर अब वह पथ मौन पड़ा,
ज्यों दीपक बिन तेल झड़ा।
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
तुम्हारा वन, मेरा एकांत,
दोनों एक ही तप का प्रांत।
तुम धर्म थे, मैं प्रेम रही,
दो धाराएँ, एक से बही।
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
अब जब भी चाँदनी झरती है,
मन की वीणा फिर भरती है।
छू जाती हूँ तुम्हारा नाम,
वह बन जाता है ध्यान, प्रणाम।
नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...
✍#महेंद्र मजबूर ©️®️
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