गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

दीमकों की दास्तान

तितलियाँ और जुगनू अंजान ही रहे,

मेरी कहानी की खुशबू से बेग़ान ही रहे।

मैंने उजालों में खुद को रखकर लिखा,

पर अंधेरों ने हर पन्ना चुपके से चखा।

शब्द मेरे स्याही से नहीं, आँसुओं से गीले थे,

हर वाक्य में कुछ अधूरे क़ीले थे।

ख़्वाबों की जिल्द में सहेजे थे राज़ कई,

पर वक़्त ने उन पर चुपचाप दीमकें भेजी कहीं।

अब वो किताब सूखी पत्तियों-सी झरती है,

हर अक्षर में सर्द खामोशी भरती है।

ना तितलियों ने रंगों में पढ़ा,

ना जुगनुओं ने रौशनी में समझा।

बस दीमकों ने जाना —

कैसे एक रूह ने ख़ामोशी में जलकर लिखा था,

और राख बनकर भी कुछ कहना चाहा था।


✍महेंद्र "मजबूर"©️®️

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