उबलता जल बोल उठा —
“मैं बँधा हूँ, फिर भी जीवित हूँ।
आग की ज्वाला मुझमें कंपन भरती है,
पर यह बर्तन —
यह मेरी मर्यादा है।”
लपटें नाचती रहीं,
मानो उसे ललकारती हों,
“छोड़ दे यह सीमा,
तब ही तो जान पाएँगे तेरे ताप का सत्य।”
पर जल मुस्कुराया —
“सीमा ही जीवन है,
अमर्यादा में तो केवल धूल है।
अगर यह बर्तन न होता,
तो मैं भी न रहता —
न आग रहती, न यह उष्णता।”
धीरे-धीरे भाप उठी,
वह आकाश से मिलने चली —
न बँधी, न टूटी,
बस रूप बदलकर मुक्त हुई।
और आग की आँखों में एक क्षण को
आश्चर्य ठहरा रहा —
मुक्ति शायद जलने में नहीं,
संयम में है।
महेंद्र 'मजबूर'
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