शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

मिट्टी के घर की आत्मा


कभी मिट्टी के घरों में

दीवारें नहीं, दिल बसते थे।

हवा रिश्तेदार लगती थी,

और दरवाज़ों पर ताले नहीं, भरोसा टँगा रहता था।

माँ की पुकार में देवता उतरते थे,

रातें छोटी, पर सपने लम्बे थे।

उस आँगन में जीवन गुनगुनाता था —

जैसे संसार अभी जन्मा हो।

अब वे घर नहीं हैं,

सिर्फ उनकी परछाइयाँ हैं,

जिन्हें शहर के शोर ने

अपने नीचे कुचल लिया है।

मैं उन्हीं परछाइयों में चलता हूँ —

एक खोई हुई गंध की तलाश में।


अब घर हैं —

पर उनमें जीवन नहीं।

हर दीवार एक स्मृति का शव है,

हर खिड़की से झाँकता है अकेलापन।

लोग मिलते हैं, पर बात नहीं करते,

बात करते हैं, पर सुनते नहीं।

चेहरों पर हँसी है —

पर वह मशीन की मुस्कान है,

जो दर्द को छिपाने के लिए लगाई जाती है।

संबंध अब नेटवर्क की सीमा तक सीमित हैं,

भावनाएँ इमोजी के प्रतीक बन गई हैं।

मिट्टी की गंध खो गई —

सीमेंट की ठंडक ने उसे ढँक लिया।


मैं पूछता हूँ —

क्या सचमुच मिट्टी कमजोर थी,

या हम ही पथराते गए भीतर से?

हमने दीवारें बनाईं —

और उन दीवारों ने हमें बाँट दिया।

हमने घर बनाए —

पर आत्मा का घर तोड़ दिया।

हमने रिश्तों को समझौतों में बदला,

संस्कारों को ‘नियमों’ में,

और प्रेम को ‘प्रक्रिया’ में।

अब जब बोलता हूँ,

शब्द खुद मुझसे कतराते हैं।

आवाज़ में एक थकावट है,

जैसे इतिहास अपनी भाषा भूल गया हो।


फिर भी, कहीं कुछ बाकी है —

किसी बूढ़ी आँख में चमक,

किसी बच्चे की हँसी में वह मिट्टी का स्वाद।

कभी किसी चूल्हे की राख में

थोड़ी-सी आग अब भी जलती है।

वहीं से आती है

एक धीमी, पर सच्ची आवाज़ —

जो कहती है,

मनुष्य अभी समाप्त नहीं हुआ है।

शायद वो दौर गया नहीं,

बस थककर सो गया है हमारे भीतर।

और जब भी कोई दिल से बोलेगा,

किसी और का दुःख बाँटेगा,

तो मिट्टी फिर से बोल उठेगी —

और तब,

हम लौटेंगे —

अपने सच्चे घर में,

जहाँ दीवारें नहीं होंगी,

सिर्फ आत्मा का उजाला होगा।


#महेंद्र 'मजबूर '©️®️

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