मैं, सुदामा —
एक छोटा-सा नाम,
इतिहास के किनारे पड़ा हुआ
अधूरा प्रसंग।
कभी मित्र था मैं कृष्ण का —
वो नंददुलारे,
जो अब द्वारका का स्वामी है,
और मैं —
अपने ही बच्चों की भूख में
भाषा खो चुका एक पिता।
पत्नी की आँखों में
सिर्फ़ जल नहीं था,
वो प्रश्न था —
कि प्रेम से पेट भरता है क्या?
मैंने उत्तर नहीं दिया,
क्योंकि मेरे शब्दों की
रोटी नहीं बनती।
घर की दीवारों से झाँकते थे
कृष्ण के बचपन के स्वर,
गोपीजन की हँसी,
और मेरे भीतर
भूख का एक विशाल समुद्र।
मैं चल पड़ा —
काँपते पैरों के साथ,
एक पोटली में चावल नहीं,
अपना आत्मसम्मान बाँधकर।
द्वारका चमक रही थी,
मैं धूल में लिपटा,
राजमहल के सामने
जैसे अपनी छाया को खोज रहा था।
कृष्ण दौड़े —
कहा, “मित्र!”
पर उस शब्द के भीतर
राजसी गूँज थी।
मैं मुस्कुराया,
सोचा —
क्या इस दरबार में
मित्रता भी वस्त्र पहनती है?
उसने पोटली खोली —
कुछ दाने,
जिनमें मेरी भूख की पूरी कहानी थी।
वो बोला, “मित्र, यह तो अमूल्य है।”
और मैं सोचता रहा —
क्या भूख भी
कभी मूल्यवान हो सकती है?
मित्रता,
भक्ति,
दया —
सब उस क्षण में
इतने चमकदार हो गए,
कि मेरी सच्चाई ओझल हो गई।
मैं लौट आया,
पर रास्ते में
मैंने देखा —
मेरे घर के द्वार पर
अब भी वही प्रश्न खड़ा था —
“प्रेम से पेट भरता है क्या?”
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