रविवार, 30 नवंबर 2025

तुम्हारा प्रेम

 कितना छोटा-सा प्रेम था तुम्हारा,

मानो किसी मौसम की घड़ी—
आया, ठहरा,
और कुछ ही पलों में लौट गया।

पर मेरा प्रेम…
वह किसी नदी की तरह है—
धीमी, लगातार बहती हुई,
चट्टानों से टकराकर भी
अपना स्वर नहीं खोती।

तुम्हारा स्नेह तो
थोड़ी-सी धूप जैसा था—
जिसे बादलों ने छुपा लिया।
मेरा प्रेम उस मिट्टी जैसा है
जो धूप-छाँव हर बार सहकर भी
अपनी खुशबू नहीं छोड़ती।

मैंने तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा—
शब्द खुद तुम्हारी ओर खिंचते चले आए।
अब ये पन्ने
मेरे जिये हुए दिनों की तरह
तुम्हारी छाया सँभाले बैठे हैं।

तुम रहो या न रहो,
मेरे भीतर एक धीमी-सी लौ जलती रहेगी,
जो प्रेम को कम नहीं होने देगी—
जो मेरे बाद भी कहेगी,
उसी शांत-सी करुण मुस्कान के साथ—

तुम हो… ना हो…
मेरा प्रेम तो रहेगा ही।

महेंद्र मजबूर 


जाता हुआ नवम्बर

 जाता हुआ नवम्बर

जैसे कोई आख़िरी चिट्ठी बिना पढ़े रखी रह जाए,
और हम सोचते रहें—
इसमें क्या लिखा होगा?

मौसम बदलता है
तो पता चलता है
कि सिर्फ़ हवा ठंडी नहीं होती,
कुछ रिश्ते भी ठंडे पड़ने लगते हैं।

साल बदल रहा है—
कैलेंडर में नहीं,
हमारी आदतों में,
हमारी चुपियों में,
उन सवालों में जिनके जवाब
कभी मिल ही नहीं पाते।

लोग बदलते हैं,
और हम सोचते रहते हैं
कि शायद अगली बार वे वहीं मिलेंगे
जहाँ हमने छोड़ा था—
पर कोई भी वहीं नहीं मिलता।

वक़्त बदलता है
तो हम समझते हैं
कि कहानियाँ बस लिखी नहीं जातीं,
वे मिटती भी रहती हैं
जैसे किसी पुराने फोटो में
चेहरे धीरे-धीरे धुँधले हो जाते हैं।

ज़िंदगी…
वह चलती तो है,
पर हर मोड़ पर थोड़ी टूटती भी है।
किसी से प्यार करते-करते
हम खुद को खो भी देते हैं,
और पाते भी हैं।

जाता हुआ नवम्बर
सिर्फ़ मौसम नहीं,
वह एक नोट है—
जो कहता है:
चलो आगे,
जहाँ जो भी बदलेगा
वही सच होगा।

महेंद्र 'मजबूर'©️®️

शनिवार, 29 नवंबर 2025

बेवफाई

 मेरी आँखों से गिरा आँसू—सवाल-ए-बेवफ़ाई है,

तेरी पलकों से जो टपका वो गवाह-ए-बेवफ़ाई है।

तू गया तो सच कहूँ दिल पर अभी तक है चुभन बाकी,
तेरी यादों का समुन्दर आज राह-ए-बेवफ़ाई है।

तेरे वादों पर यक़ीं था, इश्क़ में हसरतें भी थीं,
वक़्त के हाथों ये सब कुछ बस दास्तान-ए-बेवफ़ाई है।

मेरा रंजिश में भी तेरे नाम का ही ज़िक्र रहता है,
हर एहसास-ए-वफ़ा अब बस फ़साना-ए-बेवफ़ाई है।

तू लौटे भी तो दिल पर फिर वही पड़ जाएगी दरार,
जो टूटा है वो टूटा है—नसीहत-ए-बेवफ़ाई है।

-महेंद्र ‘मजबूर’

मैं पुरुष हूँ, पत्थर नहीं।

 मैं पुरुष हूँ,

पत्थर नहीं।


मैं भी प्रताड़ित होता हूं,

मैं भी घुटता हूं…

अंदर ही अंदर पिसता हूं,

टूटकर भी मुस्कुराता हूं,

बिखरकर भी संभल जाता हूं।


मैं रो नहीं पाता,

कह नहीं पाता,

दिल की हर दरार भीतर ही समेट लेता हूं।

पत्थर नहीं हूं…

बस समय ने जकड़ लिया है मुझे,

मैं भी किसी कंधे पर सिर रखकर

फूट-फूटकर रो लेना चाहता हूं।


मैं भी तरस जाता हूं

किसी के स्पर्श-भर के प्यार को,

एक शब्द की तसल्ली को,

एक पल की राहत को।


मगर मैं पुरुष हूं—

सो खामोशी मेरी पहचान बना दी गई,

मजबूती मेरी मजबूरी कह दी गई,

आंसुओं को हार का ताज पहना दिया गया।


पर आज कहता हूं—

मैं भी इंसान हूं,

मेरी भी धड़कनें हैं, डर हैं, थकान है,

मेरी भी एक दुनिया है जो टूटती-सी लगती है।


मैं पुरुष हूं…

पर पत्थर नहीं।

मैं भी पिघलना चाहता हूं,

जीना चाहता हूं,

सुन लिया जाऊं—

बस इतना चाहता हूं।


-महेंद्र 'मजबूर'

मै ही प्रतिवादी

 

मैं देखता हूँ—
दूसरों की कमियों का विराट जंगल,
जहाँ दोषों की लतरें साँप-सी फुफकारती हैं,
और मैं, एक शिकारी की तरह,
निशाने साधता हूँ हर अँधेरे पर।

पर अचानक—
मेरे भीतर की नंगी दीवारें हिलने लगती हैं,
मेरे ही मन की दरारों से
किसी गहरे अपराध की गंध उठती है।

हाँ, मैं जानता हूँ—
दुनिया की सारी उँगलियाँ बाहर की ओर मुड़ सकती हैं
पर मेरी अपनी उँगली काँपती है,
जब उसे खुद पर टिकाना पड़ता है।

क्या यही मेरा सच है?
मेरी आत्मा के नीचे छुपा वह गाढ़ा काला द्रव,
जहाँ हर गलती का हिसाब है,
पर मैं उसे छोटा कर देता हूँ,
दूसरों की भूलों को पर्वत बनाकर।

यह दोहरा चेहरा,
यह अजीब, अनाम, अतल अपराधबोध—
जो मेरे भीतर जलता रहता है,
एक धीमी आग की तरह।

मैं सोचता हूँ—
दुनिया बदतर नहीं है,
हमारे अंदर की वह छोटी-सी अंधी जगह है
जहाँ हम सत्य से मुड़ जाते हैं,
जहाँ आत्म-निरीक्षण सबसे बड़ी पराजय लगता है।

क्योंकि सच तो यह है—
कि दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाना सरल है,
पर खुद के भीतर उतरना,
सबसे क्रूर यात्रा है।

और वहीं कहीं,
मेरी मनुष्यता का हिसाब लिखा है…
जिसे पढ़ने से मैं सबसे ज़्यादा डरता हूँ।

महेंद्र "मजबूर"

इज्ज़त का सफर

 इज्ज़त का सफर



चलो निकलो बिना सहारे,

ख्वाबों को झोली में लेकर,

कुछ रास्ते तुम्हें रोकेंगे,

कुछ चल देंगे तुम्हारे संग होकर।


खाली जेब का हर सिक्का,

तजुर्बों से भर जाएगा,

जो झुककर हँसता है आज,

कल वही सिर उठाकर चमक जाएगा।


इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती,

पसीने से उगानी पड़ती है,

गिरने की भी एक कीमत होती है,

और उठने की भी कहानी पड़ती है।


कदम मुश्किल ज़रूर होंगे,

मगर मंज़िलें भी इंतज़ार में हैं,

हर संघर्ष में एक सबक है,

हर हार जीत की तैयार में है।


खाली हाथ से जो चल पड़े,

उसी ने दुनिया जीती है,

वहम छोड़ो—हक़ीक़त कहती है,

इज़्ज़त मेहनत से ही मिलती है।


महेंद्र 'मजबूर'

मजबूरी का तख्त

 हमें कभी मुकद्दस निगाहों से देखा ही नहीं गया,

हमारे भीतर की रोशनी को समझा ही नहीं गया।
हमने दिलों में महल बनाए, उम्मीदें सजाईं,
पर ज़माने ने हमें पैरों की ख़ाक समझा।

हम राजा थे अपने सपनों के, अपनी रूह के,
मगर हालातों ने हमें मजबूर सा लिख दिया।
किस्मत की लकीरों में ताक़त थी बहुत,
पर हाथों में ज़ंजीरों का वक़्त थमा रहा।

हम मुस्कुराए भी तो दर्द की कीमत देकर,
हम चले भी तो रेत पर काँटे रखकर।
शान छुपाकर भी सीना तान कर चलते रहे,
क्योंकि हक़ था हमारा—भले दुनिया ने न दिया।

हम मजदूर भी थे, हम ही शहंशाह भी,
बस अंतर इतना था—दुनिया ने हमें जाना नहीं।
हमारे भीतर जो आग थी, उसने हमेशा कहा—
राजा होना ताज पहनना नहीं, गिरकर भी खड़ा रहना है।

महेंद्र 'मजबूर'