वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुस्कुराकर, खामोशियों में कुछ कह गया।
ना अलविदा कहा, ना मुड़कर देखा,
बस हवाओं में अपनी खुशबू छोड़ गया।
कभी लगता है, अब सब ठीक है,
पर दिल के किसी कोने में तू अब भी ज़िंदा है।
तेरी हँसी, तेरी बातें, तेरे वो छोटे इशारे,
हर रोज़ एक नया ज़ख्म दे जाते हैं।
रातें अब भी तेरे नाम की होती हैं,
नींद आती है, मगर चैन नहीं।
तकिए के उस पार अब भी तेरा ख्याल सोता है,
और मेरी आँखें बस उसे जगाती रहती हैं।
वो चाँद, जो कभी तेरे साथ देखा था,
अब भी उतना ही रोशन है,
बस फर्क इतना है कि अब वो मुझसे पूछता नहीं,
“क्यों तेरा चेहरा उदास है?”
कभी सोचता हूँ, तुझसे फिर मुलाक़ात हो जाए,
कहीं राहों में, यूँ ही बेख़्याल हो जाए।
क्या तू पहचानेगा मुझे?
या फिर किसी अनजान की तरह नज़रें चुरा ले जाएगा?
तेरे वादे अब भी मेरी सांसों में गूंजते हैं,
तेरे झूठ अब भी सच लगते हैं।
हर ख़ुशी, हर हँसी, हर जश्न में,
तेरे नाम का साया दिखता है।
लोग कहते हैं—“वक़्त सब ठीक कर देता है”,
पर वक़्त ने बस मुझे खामोश करना सिखाया है।
ज़ख्म तो भर जाते हैं, मगर निशान,
वो अब भी तेरे नाम के हैं।
अब मैं चलता हूँ उसी रास्ते पर,
जहाँ तू कभी मेरे साथ था।
हवा अब भी वैसी ही चलती है,
बस उसमें तेरी आवाज़ नहीं आती।
तेरे जाने से ज़िन्दगी नहीं रुकी,
पर जीने का मतलब कहीं खो गया।
अब जो मुस्कुराता हूँ, तो लगता है,
मानो तेरी यादों से समझौता कर रहा हूँ।
वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुझे तन्हा करने नहीं—
मुझे मेरे भीतर के “मैं” से मिलाने चला गया।
महेंद्र 'मजबूर'