बुधवार, 30 जनवरी 2019

हरिया


हरिया बस नाम से ही जहन मै उतर आती है । वो गोल बडी आँखे जो अपनी पहचान या उस बनाने वाले से सवाल करती नजर आती है मैले कपडे सूखा अद्कचा बदन हाँ मैं हरिया की बात कर रहा हूँ शायद अगर किसी अमीर के घर पैदा हुआ होता तो हरीश,हर्ष होता । मैं उसे मेरे विद्यालय में सप्ताह में एक बार जरूर देखता हूँ। विद्यालय मै शौचालय साफ़ करने आता है अभी उसके खेलने पढने की उमर थी पर वह यह काम करने को मजबूर।
दिल रोज करता की मै उस से बात करू उससे पूछू पर हिम्मत नही जुटा पाता हर रोज बस सोच कर ही रह जाता । आज न जाने क्यो मुझे अध्यापन कराने का मन नही हो रहा था कक्षा कक्ष की खिडकी से बाहर देखा तो तभी हरीया मुझे दिखा मै सोचने लगा आज वह यहाँ कैसे वह तो शनिवार को आता है।
पर कुछ समय बाद सारा माजरा समझ आ गया संस्थाप्रधान मोहदय ने गणतंत्र दिवस की मिठाई बांटी थी तो बच्चो से बरामदा गंदा हो गया था तो उसे सफाई के लिए बुलाया था। पर आज तो अगर उस गरीब को भगवान भी देखता तो उसका दिल भी पसीज जाता तो मै तो एक सामान्य ईन्सान हूँ ,उन नन्हे हाथो से साबून घीस- घीस कर वो बरामदा धो रहा था पानी की बाल्टीयाँ बडी मुस्किल से उठा उठा ला रहा था । और बरामदे की सफाई बड़ी निष्ठा से कर रहा था अगर उसकी जगह कोई और होता तो इतनी ईमानदारी से काम नही करता मुझ से रहा नही गया। कक्षा कक्ष से बहार आया तो देखा संस्था प्रधान महोदय खुद उसे निर्देशन दे रहे थे। मेरे कदमो को विवस हो कक्षा कक्ष की और मुडना पडा । मन ही मन सोचने लगा बच्चे से कम किमत मै काम करवा बचत करने वाले क्या अपने बच्चे से ये सब करवा सकते है । गरीब और निम्न वर्ग का होना क्या इस के हाथ मै था या उसकी इच्छा क्या इस गणतंत्र का वो हिस्सा नही उसको भी कुछ मिठाई देते, मुह मीठा नही बस काम । ऐसे सवाल बहुत थे पर जवाब मेरे के खुद पास भी नही।
सफाई हो गई तो एक बच्चे को भेज मैंने हरिया को बुलवाया
कक्षा मै आते ही सभी बच्चो को ऐसे देखने लगा जैसे वो भी बैठ जाए पढाई करने।
मैने उसे अपने पास बुलाया और पूछा पढ़ना है कुछ ना बोला बस एक टूक देखता रहा मैने पूछा तेरे पिताजी क्या करते है। मास्साब वो मुआ परा। बस उतना ही बोल पाया आँखो का पानी गले उतर आया शायद और बस चल दिया । बच्चो से पता चला साल भर पहले ही उनका देहान्त हो गया था। घर मै माँ और दो छोटी बहने थी माँ अपाहिज है तो घर का बोझ उन नन्हें कन्धो पर आ गया। माना किस्मत है हरिया की पर इन पढ़े लिखो को तो अपने जमीर को जगाना चाहिए कब तक आज भी हरिया यू बेबस रोता रहेगा ।क्या नया दौर है ये।क्या देश बदल रहा है ।क्या अच्छे दिन कभी नही आएगे उस मासूम कै। क्या उन आँखो के अन कहे प्रश्नों के उत्तर कोई नही।।
महेंद्र " मजबूर " ©
जीरावल सिरोही ( राजस्थान )

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

"वो जो चला गया"


वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुस्कुराकर, खामोशियों में कुछ कह गया।
ना अलविदा कहा, ना मुड़कर देखा,
बस हवाओं में अपनी खुशबू छोड़ गया।
कभी लगता है, अब सब ठीक है,
पर दिल के किसी कोने में तू अब भी ज़िंदा है।
तेरी हँसी, तेरी बातें, तेरे वो छोटे इशारे,
हर रोज़ एक नया ज़ख्म दे जाते हैं।
रातें अब भी तेरे नाम की होती हैं,
नींद आती है, मगर चैन नहीं।
तकिए के उस पार अब भी तेरा ख्याल सोता है,
और मेरी आँखें बस उसे जगाती रहती हैं।
वो चाँद, जो कभी तेरे साथ देखा था,
अब भी उतना ही रोशन है,
बस फर्क इतना है कि अब वो मुझसे पूछता नहीं,
“क्यों तेरा चेहरा उदास है?”
कभी सोचता हूँ, तुझसे फिर मुलाक़ात हो जाए,
कहीं राहों में, यूँ ही बेख़्याल हो जाए।
क्या तू पहचानेगा मुझे?
या फिर किसी अनजान की तरह नज़रें चुरा ले जाएगा?
तेरे वादे अब भी मेरी सांसों में गूंजते हैं,
तेरे झूठ अब भी सच लगते हैं।
हर ख़ुशी, हर हँसी, हर जश्न में,
तेरे नाम का साया दिखता है।
लोग कहते हैं—“वक़्त सब ठीक कर देता है”,
पर वक़्त ने बस मुझे खामोश करना सिखाया है।
ज़ख्म तो भर जाते हैं, मगर निशान,
वो अब भी तेरे नाम के हैं।
अब मैं चलता हूँ उसी रास्ते पर,
जहाँ तू कभी मेरे साथ था।
हवा अब भी वैसी ही चलती है,
बस उसमें तेरी आवाज़ नहीं आती।
तेरे जाने से ज़िन्दगी नहीं रुकी,
पर जीने का मतलब कहीं खो गया।
अब जो मुस्कुराता हूँ, तो लगता है,
मानो तेरी यादों से समझौता कर रहा हूँ।
वो जो चला गया, बस यूँ ही,
मुझे तन्हा करने नहीं—
मुझे मेरे भीतर के “मैं” से मिलाने चला गया। 

महेंद्र 'मजबूर'

रविवार, 26 जून 2016

तलाश

जीवन

रेत

सा

तुम
मरिचिका

भटकन
दिल

तलाश
प्यास

प्रेम
दूर

धूप
जलन

रेत
अंतहीन

कदम
थके

सांस
रुकी

फिर
खुशबू

हवा
छुई

तुम
उतरी

पलकों
पर

सच
बनी

कंठ
तर

दिल
भरा

धूप
दुलार

रेगिस्तान
मुस्कुराया

ओस
गिरी

नाम
तेरा

जीवन
मिला।

जीवन
रेत

तुम
मरीचिका

दिल
भटका

प्यास
जगी

धूप
चुभी

रेत
झरी

कदम
थके

सांस
रुकी

हवा
बही

खुशबू
आई

तुम
उतरी

नज़र
भीगी

कंठ
तरा

धूप
मुलायम

रेत
गुनगुनी

दिल
हँसा

ओस
गिरी

नाम
तेरा

जीवन
खिला।

महेंद्र 'मजबूर'


पनघट की गोरी

एक प्रेम कथा — रेत, नदिया और स्मृतियों के बीच

भाग १ — “गोरी पनघट पे”

छम छम पायल,
बजे रे गोरी,
घाट किनारे
खड़ी ठठोली।

नील गगन में
उड़े अँचरा,
धूप पिए
जल में सवेरा।

नैन कटारी,
हँसी चकोरी,
बोले कुछ ना,
कहे सब गोरी।

हाथ कंगना,
चूड़ी छनके,
घट उठावे
मृदु तन थरके।

झर-झर नदिया,
गीत सुनावे,
प्रीत पुरानी
फिर बहकावे।

कछु ना बोले,
मन मुस्कावे,
पनघट वाला
नयन मिलावे।

भाग २ — “साँझ ढले गोरी”

साँझ ढले रे,
गोरी आई,
धूप झरे,
छाँव समाई।

घट में पानी,
नयन में सपना,
पग में थिरकन,
मन में अपना।

चाँद झुके रे,
नीर चमकाए,
गोरी झुके तो
बिंदिया जगमगाए।

डरती बोले,
धीरे-धीरे,
“मत देखो यूँ,
नयन पगीरे।”

पवन बहे तो,
चूनर डोले,
बन के बिजली,
तन पे बोले।

घर की देहरी,
नज़दीक आई,
पीछे मुड़ के
मुस्कुराई।

मन कहे धीरे —
फिर पनघट पे,
कल ही आऊँ,
ओ रे सजन।

भाग ३ — “भोर भये पनघट”

भोर भये रे,
गोरी आई,
नींद नयन की
ओस बन पाई।

घट उठावे,
गुनगुन गावे,
मन में छुपा
गीत सुनावे।

झर-झर नदिया,
संग बहाए,
चुनरी छूके
हवा लजाए।

साजन आया,
धीरे बोला,
“गोरी रुक जा,
दिल मत तोला।”

गोरी हँसी,
नैन झुकाए,
गागर हिलते
प्रीत छलकाए।

रेत पे लिखे,
दो नाम सजन,
लहर ने ढाके,
फिर दे चुम्बन।

भोर सजीली,
धूप सुहानी,
पनघट बन गया —
प्रेम कहानी।

भाग ४ — “फिर पनघट आई”

बरस बीते,
धूप बदल गई,
गोरी की चूनर
रंग छलक गई।

पनघट वैसा,
नदिया वैसी,
पर मन में अब
शांति बैसी।

गागर उठाई,
धीरे-धीरे,
नैन भरे
बीते सब पीरे।

पग रुके,
जल में देखा,
अपना चेहरा,
सपना रेखा।

जहाँ लिखा था,
नाम दो जन,
रेत में अब
सिर्फ चिन्ह धन।

हवा चली,
मन मुस्काया,
यादों ने फिर
गीत सुनाया।

गोरी बोली,
धीरे स्वर में,
“साजन, तू है
हर लहर में।”

घट भरे,
घर को चली,
रेत पे छोड़ी
छवि भली।

भोर से लेकर
साँझ तलक,
प्रेम रहा —
अविरल, निःशब्द।

महेंद्र मजबूर 

सोमवार, 20 जून 2016

सुदामा


कलम मेरी आज रो पडी
जब मन के भाव वो जान गई।
सुनाउ एक करूण कहानी
पत्नि बोली रुन्धे गले
स्वामी मै भूखी रह लुंगी
पर
नाथ मेरे इन बच्चो को
भूख तडपावे
सुन सुदामा की अखियन आंसू फुटे
बोले
तुही बता क्या करु मेरे करम फुटे
मांगण की नही आदत मोहे
ना धरम देत स्वीकृति
पत्नी सुझायो एक मारग
बोली दीन सुदामा से
स्वामी सखा थे तोरे
कोई नंददुलारे
सुना सखियन सु
राजन है वह बड भागे
स्वामी क्यो ना मिल आये
मित्रता का दे वास्ता
कछु याचना कर आये
सुदामा की भीगी अखियन
बहा अश्रु स्वीकृति दिनी
बान्ध लाई कछु चावल पोटली
दीना सुदामा हाथ
करुण काया करूण दशा
चलत सुदामा मित्र द्वार द्वारिकानाथ 

महेंद्र 'मजबूर'

रविवार, 19 जून 2016

सजनी

सजनी,
तू गई तो हवा भी थम-सी गई...
सावन आया, पर बरस न सका,
शायद तेरे कदमों की आहट का इंतज़ार कर रहा है।

तू बिन —
हर बूँद अधूरी लगती है,
हर खुशबू तेरे नाम में खो जाती है।

रात भर तकिया भीगता रहा,
कोई बादल खिड़की से झाँक गया,
शायद उसे भी तेरी याद आई थी।

नयन बंद करता हूँ —
तो तू आती है...
धीरे से, जैसे पुरानी धुन लौटती है,
और चली जाती है,
ठीक उसी तरह जैसे यादें —
जो रह जाती हैं,
पर मिलती नहीं।

सजनी,
अब जब भी हवा चलती है,
मैं समझता हूँ —
तेरे आँचल ने ज़रा-सा हिला दिया होगा।



बरसों बाद...
आज फिर बारिश आई है,
वैसी ही —
धीरे-धीरे,
छत की मुंडेर से फिसलती बूँदें,
और हवा में तेरी खुशबू का एक कोना...

सजनी,
अब तू याद तो आती है,
पर दर्द नहीं होता —
बस, एक हल्की-सी मुस्कान सी उठती है,
जैसे पुरानी चिट्ठी के किनारे
अभी भी तेरी उँगलियों की गर्मी बची हो।

अब भी कभी-कभी,
बारिश की बूँद जब गाल छू जाती है,
तो लगता है — तूने धीरे से कुछ कहा था,
पर हवा ने सुना नहीं...

तेरे बिना अब भी अधूरा हूँ,
पर अब अधूरापन भी मेरा हिस्सा है,
जैसे टूटी हुई चूड़ी,
जो अब गले लगती नहीं,
पर छोड़ी भी नहीं जाती।

सजनी,
तू जहाँ भी हो —
खुश रहना।
तेरी याद अब मेरा दर्द नहीं,
बस, एक मौसम है —
जो हर सावन लौट आता है... 

महेंद्र "मजबूर"©️®️

शनिवार, 18 जून 2016

तस्वीर उसकी

आज इतना पिला कि साक़ी

आज इतना पिला कि साक़ी, होश भी बेवफ़ा हो जाए,
दिल में बसी तस्वीर उसकी, अश्कों में फ़ना हो जाए।

वो जो कभी ख्वाबों का आलम था, अब हकीकत की चुभन है,
जिसे खुदा समझ बैठे थे, अब वही दर्द-ए-वतन है।

रंगीन जहाँ अब बेरंग है, दिल वीरान, न रोशनी,
उसकी यादों के साये में, हर शाम सज़ा हो जाए।

वो वादियाँ, वो दूधिया बादल, अब ख़ामोश पहर में खोए,
कभी जो साथ चलता था, अब बस दुआ हो जाए।

सुन दिल की हर धड़कन में, उसका नाम बसा है गहरा,
हम मुस्कराएँ भी तो दर्द-ए-जुदाई हँसी बना हो जाए।

जो न समझा तमाम उम्र हमें, वही अब ख़यालों में बसता,
जिसे पाने की आरज़ू की थी, अब वही सजा हो जाए।

ऐ साक़ी, आज इतना पिला कि तन्हाई भी साथ छोड़ दे,
इन आँसुओं की आख़िरी बूँद भी रुख़्सत-ए-वफ़ा हो जाए।


"मजबूर" अब क्या कहें तुझसे, ये दिल तो हार गया,
उसकी यादों का ज़हर भी अब जैसे दवा हो जाए... 

महेंद्र 'मजबूर'