शनिवार, 29 नवंबर 2025

मैं पुरुष हूँ, पत्थर नहीं।

 मैं पुरुष हूँ,

पत्थर नहीं।


मैं भी प्रताड़ित होता हूं,

मैं भी घुटता हूं…

अंदर ही अंदर पिसता हूं,

टूटकर भी मुस्कुराता हूं,

बिखरकर भी संभल जाता हूं।


मैं रो नहीं पाता,

कह नहीं पाता,

दिल की हर दरार भीतर ही समेट लेता हूं।

पत्थर नहीं हूं…

बस समय ने जकड़ लिया है मुझे,

मैं भी किसी कंधे पर सिर रखकर

फूट-फूटकर रो लेना चाहता हूं।


मैं भी तरस जाता हूं

किसी के स्पर्श-भर के प्यार को,

एक शब्द की तसल्ली को,

एक पल की राहत को।


मगर मैं पुरुष हूं—

सो खामोशी मेरी पहचान बना दी गई,

मजबूती मेरी मजबूरी कह दी गई,

आंसुओं को हार का ताज पहना दिया गया।


पर आज कहता हूं—

मैं भी इंसान हूं,

मेरी भी धड़कनें हैं, डर हैं, थकान है,

मेरी भी एक दुनिया है जो टूटती-सी लगती है।


मैं पुरुष हूं…

पर पत्थर नहीं।

मैं भी पिघलना चाहता हूं,

जीना चाहता हूं,

सुन लिया जाऊं—

बस इतना चाहता हूं।


-महेंद्र 'मजबूर'

मै ही प्रतिवादी

 

मैं देखता हूँ—
दूसरों की कमियों का विराट जंगल,
जहाँ दोषों की लतरें साँप-सी फुफकारती हैं,
और मैं, एक शिकारी की तरह,
निशाने साधता हूँ हर अँधेरे पर।

पर अचानक—
मेरे भीतर की नंगी दीवारें हिलने लगती हैं,
मेरे ही मन की दरारों से
किसी गहरे अपराध की गंध उठती है।

हाँ, मैं जानता हूँ—
दुनिया की सारी उँगलियाँ बाहर की ओर मुड़ सकती हैं
पर मेरी अपनी उँगली काँपती है,
जब उसे खुद पर टिकाना पड़ता है।

क्या यही मेरा सच है?
मेरी आत्मा के नीचे छुपा वह गाढ़ा काला द्रव,
जहाँ हर गलती का हिसाब है,
पर मैं उसे छोटा कर देता हूँ,
दूसरों की भूलों को पर्वत बनाकर।

यह दोहरा चेहरा,
यह अजीब, अनाम, अतल अपराधबोध—
जो मेरे भीतर जलता रहता है,
एक धीमी आग की तरह।

मैं सोचता हूँ—
दुनिया बदतर नहीं है,
हमारे अंदर की वह छोटी-सी अंधी जगह है
जहाँ हम सत्य से मुड़ जाते हैं,
जहाँ आत्म-निरीक्षण सबसे बड़ी पराजय लगता है।

क्योंकि सच तो यह है—
कि दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाना सरल है,
पर खुद के भीतर उतरना,
सबसे क्रूर यात्रा है।

और वहीं कहीं,
मेरी मनुष्यता का हिसाब लिखा है…
जिसे पढ़ने से मैं सबसे ज़्यादा डरता हूँ।

महेंद्र "मजबूर"

इज्ज़त का सफर

 इज्ज़त का सफर



चलो निकलो बिना सहारे,

ख्वाबों को झोली में लेकर,

कुछ रास्ते तुम्हें रोकेंगे,

कुछ चल देंगे तुम्हारे संग होकर।


खाली जेब का हर सिक्का,

तजुर्बों से भर जाएगा,

जो झुककर हँसता है आज,

कल वही सिर उठाकर चमक जाएगा।


इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती,

पसीने से उगानी पड़ती है,

गिरने की भी एक कीमत होती है,

और उठने की भी कहानी पड़ती है।


कदम मुश्किल ज़रूर होंगे,

मगर मंज़िलें भी इंतज़ार में हैं,

हर संघर्ष में एक सबक है,

हर हार जीत की तैयार में है।


खाली हाथ से जो चल पड़े,

उसी ने दुनिया जीती है,

वहम छोड़ो—हक़ीक़त कहती है,

इज़्ज़त मेहनत से ही मिलती है।


महेंद्र 'मजबूर'

मजबूरी का तख्त

 हमें कभी मुकद्दस निगाहों से देखा ही नहीं गया,

हमारे भीतर की रोशनी को समझा ही नहीं गया।
हमने दिलों में महल बनाए, उम्मीदें सजाईं,
पर ज़माने ने हमें पैरों की ख़ाक समझा।

हम राजा थे अपने सपनों के, अपनी रूह के,
मगर हालातों ने हमें मजबूर सा लिख दिया।
किस्मत की लकीरों में ताक़त थी बहुत,
पर हाथों में ज़ंजीरों का वक़्त थमा रहा।

हम मुस्कुराए भी तो दर्द की कीमत देकर,
हम चले भी तो रेत पर काँटे रखकर।
शान छुपाकर भी सीना तान कर चलते रहे,
क्योंकि हक़ था हमारा—भले दुनिया ने न दिया।

हम मजदूर भी थे, हम ही शहंशाह भी,
बस अंतर इतना था—दुनिया ने हमें जाना नहीं।
हमारे भीतर जो आग थी, उसने हमेशा कहा—
राजा होना ताज पहनना नहीं, गिरकर भी खड़ा रहना है।

महेंद्र 'मजबूर'

आग का यात्री

 

आग का यात्री

मैंने बचपन खो दिया था—
किसी अदृश्य उद्घोष की तरह,
जहाँ मासूमियत का स्वर
समय की फटी किताबों में दबा पड़ा था।

फिर मैं गिरा—
मनुष्य की उस खोह में,
जहाँ छल है, धोखा है, पाखंड है,
और हर चेहरा एक मुखौटा,
हर हाथ पर झूठ की परतें।

यह जीवन नहीं—
एक भट्टी है,
जहाँ मैं स्वर्ण नहीं,
बल्कि आग में उलझा हुआ प्रश्न हूँ।

धधकता हुआ अहंकार—
कभी मुझे जला देता है,
कभी मुझे बुझा देता है,
पर मैं न पूर्ण राख हूँ
न पूर्ण ज्योति।

मैं धुआँ हूँ—
त्रिशंकु-सा लटका,
अधूरी मृत्यु के अँधेरे में।

क्योंकि ज्ञान एक ऐसा दंश है
जो लौटने नहीं देता,
अनुभव एक ऐसा सत्य
जो भुलाया नहीं जा सकता।

मैं समय के विरुद्ध नहीं,
पर उसके भीतर जूझ रहा हूँ—
उस नदी में जहाँ लौटना वर्जित है,
और आगे बढ़ना अनिवार्य।

हाँ, सोना निखरता है आग में,
पर हमेशा जलता रहे—
यह भी एक कैद है!

इसलिए मैं संघर्ष करता हूँ—
अपने भीतर के मनुष्य से,
अपनी ही राख से,
अपने ही अंधकार से।

एक दिन
यह आग मुझे मुक्त करेगी—
या तो मैं जलकर समाप्त हो जाऊँगा,
या स्वर्ण की अंतिम चमक में
अपने भीतर का सत्य पा लूँगा।

-महेंद्र 'मजबूर'

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अधूरी ज़िंदगी

 अधूरी ज़िंदगी 

ज़िंदगी, तू सच में हसीं है,
फूलों की महक, हवा की सरसराहट — सब तेरी है।
फिर भी…
जब वह पास नहीं,
तू अधूरी सी लगती है।

हर सुबह में तेरी रौशनी है,
हर शाम में तेरे रंग हैं,
फिर भी…
उसकी यादों के बिना,
तेरी खुशियाँ भी कुछ फीकी सी हैं।

मैं चलता हूँ तेरे रास्तों पर,
साँसें भरता हूँ तेरी हवा में,
फिर भी…
उसके बिना, मेरी ज़िंदगी
जैसे अधूरी कहानी सी है।

तेरी हँसी भी अधूरी है,
तेरी ख़ुशियाँ भी अधूरी हैं,
और मैं…
बस उसका इंतजार करता हूँ,
कि लौट आए, और तू पूरी सी लगे।

-महेंद्र 'मजबूर'

बाकी तो नहीं

मेरे दिल में तेरी यादों का कोई असर बचा बाकी तो नहीं,

तेरी मोहब्बत की राख में कोई चिन्ह जगा बाकी तो नहीं।

तेरे जाने से टूटी हर आस, हर ख्वाब अधूरा रहा,
इन ख़ामोशियों में कोई पुरानी दुआ बाकी तो नहीं।

तेरी आँखों की गहराई में मेरी साँसें खो गईं,
इस वीराने में कोई तेरी याद बसा बाकी तो नहीं।

हर दर्द मैंने अपने भीतर सहा और संभाला है,
इन अश्क़ों में कोई राहत छुपा बाकी तो नहीं।

तेरी हँसी की हल्की आहट आज भी दिल को छूती है,
इन पलकों में कोई रोशनी जगा बाकी तो नहीं।

हमने जो वादे कभी निभाने की ठानी थी,
इन फासलों में कोई निशां बचा बाकी तो नहीं।

आख़िरी बार पूछ लें दिल से ये सवाल,
तेरे बिना हमारे बीच मोहब्बत बचा बाकी तो नहीं।

तुम्हारे लौटने की राह अब भी वीरान है,
इन रास्तों में कोई ठंडी छाँव जगा बाकी तो नहीं।

जो खोया, उसे यादों में सावधानी से रखा है,
इन लम्हों में कोई ख़ुशी बसी बाकी तो नहीं।

तेरे बिना यह जीवन आधा और सुनसान लगता है,
इस दुनिया में कोई साया, कोई हमसफ़र बाकी तो नहीं।

यादों का सिलसिला अब भी धीरे चलता है,
इन रातों में कोई चिंगारी जगा बाकी तो नहीं।

मेरी तन्हाई अब सिर्फ़ तेरे नाम की गवाही देती है,
इन दीवारों में कोई आवाज़ बाकी तो नहीं।

तूने जो छोड़ दिया, वह दर्द अब तक मेरे साथ है,
इस बिखरे दिल में कोई राहत बची बाकी तो नहीं।

हर साँस में तेरी कमी गहरी तरह महसूस होती है,
इस जीवन में कोई राहत जगा बाकी तो नहीं।

और जब चाँद भी तन्हा आसमान में झिलमिलाता है,
इस दिल की खामोशी में कोई रोशनी बाकी तो नहीं।

महेंद्र "मजबूर"©️®️