शनिवार, 1 नवंबर 2025

माया मोह का जाल

 


✍️ रचनाकार: महेंद्र मजबूर 

(1)
जग भ्रम में सब जी रहे, बोले “मेरा-तेरा”,
साँच कहे महेंद्र यह, कुछ भी नाहीं तेरा॥

(2)
माटी के घर में बसत, माटी तन का रूप,
आया खाली हाथ तू, जाएगा भी धूप॥

(3)
दिन दो पल का मेला यह, सबकी अपनी चाल,
कागज जैसे उड़ चले, टूटे हर जंजाल॥

(4)
माया के बंधन में जग, सब उलझा मुस्काय,
देख सच्चा जो रूप जब, मन भीतर हरषाय॥

(5)
धन दौलत कुल जात सब, सपनों के ही छंद,
जागे जो यह जान ले, सच्चा वही प्रचंड॥

(6)
ना राजा तू, ना भिखारी, ना तेरा पहचान,
बस एक यात्री मनुज है, चलता प्रभु के धाम॥

(7)
मन का मोह ही जाल है, इसमें जग उलझाय,
छोड़ अभिमान मोह सब, सच्चा सुख मिल जाय॥

(8)
साँस-साँस हरि नाम ले, मन से कर अरदास,
क्षण में यह जीवन ढले, जैसे जल की आस॥

(9)
लोभ, क्रोध तृष्णा त्यज, मत कर मन को भर,
जो भीतर दीपक जले, वही सच्चा सुंदर॥

(10)
सत्य प्रेम करुणा धर, त्यज दे अभिमान,
यही है जीवन सार तू, यही प्रभु का ज्ञान॥

(11)
जग में आया खेल कर, मत भूल प्रभु नाम,
महेंद्र कहे यही सिखा — सबमें एक ही राम॥

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

मिट्टी के घर की आत्मा


कभी मिट्टी के घरों में

दीवारें नहीं, दिल बसते थे।

हवा रिश्तेदार लगती थी,

और दरवाज़ों पर ताले नहीं, भरोसा टँगा रहता था।

माँ की पुकार में देवता उतरते थे,

रातें छोटी, पर सपने लम्बे थे।

उस आँगन में जीवन गुनगुनाता था —

जैसे संसार अभी जन्मा हो।

अब वे घर नहीं हैं,

सिर्फ उनकी परछाइयाँ हैं,

जिन्हें शहर के शोर ने

अपने नीचे कुचल लिया है।

मैं उन्हीं परछाइयों में चलता हूँ —

एक खोई हुई गंध की तलाश में।


अब घर हैं —

पर उनमें जीवन नहीं।

हर दीवार एक स्मृति का शव है,

हर खिड़की से झाँकता है अकेलापन।

लोग मिलते हैं, पर बात नहीं करते,

बात करते हैं, पर सुनते नहीं।

चेहरों पर हँसी है —

पर वह मशीन की मुस्कान है,

जो दर्द को छिपाने के लिए लगाई जाती है।

संबंध अब नेटवर्क की सीमा तक सीमित हैं,

भावनाएँ इमोजी के प्रतीक बन गई हैं।

मिट्टी की गंध खो गई —

सीमेंट की ठंडक ने उसे ढँक लिया।


मैं पूछता हूँ —

क्या सचमुच मिट्टी कमजोर थी,

या हम ही पथराते गए भीतर से?

हमने दीवारें बनाईं —

और उन दीवारों ने हमें बाँट दिया।

हमने घर बनाए —

पर आत्मा का घर तोड़ दिया।

हमने रिश्तों को समझौतों में बदला,

संस्कारों को ‘नियमों’ में,

और प्रेम को ‘प्रक्रिया’ में।

अब जब बोलता हूँ,

शब्द खुद मुझसे कतराते हैं।

आवाज़ में एक थकावट है,

जैसे इतिहास अपनी भाषा भूल गया हो।


फिर भी, कहीं कुछ बाकी है —

किसी बूढ़ी आँख में चमक,

किसी बच्चे की हँसी में वह मिट्टी का स्वाद।

कभी किसी चूल्हे की राख में

थोड़ी-सी आग अब भी जलती है।

वहीं से आती है

एक धीमी, पर सच्ची आवाज़ —

जो कहती है,

मनुष्य अभी समाप्त नहीं हुआ है।

शायद वो दौर गया नहीं,

बस थककर सो गया है हमारे भीतर।

और जब भी कोई दिल से बोलेगा,

किसी और का दुःख बाँटेगा,

तो मिट्टी फिर से बोल उठेगी —

और तब,

हम लौटेंगे —

अपने सच्चे घर में,

जहाँ दीवारें नहीं होंगी,

सिर्फ आत्मा का उजाला होगा।


#महेंद्र 'मजबूर '©️®️

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

दीमकों की दास्तान

तितलियाँ और जुगनू अंजान ही रहे,

मेरी कहानी की खुशबू से बेग़ान ही रहे।

मैंने उजालों में खुद को रखकर लिखा,

पर अंधेरों ने हर पन्ना चुपके से चखा।

शब्द मेरे स्याही से नहीं, आँसुओं से गीले थे,

हर वाक्य में कुछ अधूरे क़ीले थे।

ख़्वाबों की जिल्द में सहेजे थे राज़ कई,

पर वक़्त ने उन पर चुपचाप दीमकें भेजी कहीं।

अब वो किताब सूखी पत्तियों-सी झरती है,

हर अक्षर में सर्द खामोशी भरती है।

ना तितलियों ने रंगों में पढ़ा,

ना जुगनुओं ने रौशनी में समझा।

बस दीमकों ने जाना —

कैसे एक रूह ने ख़ामोशी में जलकर लिखा था,

और राख बनकर भी कुछ कहना चाहा था।


✍महेंद्र "मजबूर"©️®️

उबाल और शांति

 

उबलता जल बोल उठा —

“मैं बँधा हूँ, फिर भी जीवित हूँ।
आग की ज्वाला मुझमें कंपन भरती है,
पर यह बर्तन —
यह मेरी मर्यादा है।”

लपटें नाचती रहीं,
मानो उसे ललकारती हों,
“छोड़ दे यह सीमा,
तब ही तो जान पाएँगे तेरे ताप का सत्य।”

पर जल मुस्कुराया —
“सीमा ही जीवन है,
अमर्यादा में तो केवल धूल है।
अगर यह बर्तन न होता,
तो मैं भी न रहता —
न आग रहती, न यह उष्णता।”

धीरे-धीरे भाप उठी,
वह आकाश से मिलने चली —
न बँधी, न टूटी,
बस रूप बदलकर मुक्त हुई।

और आग की आँखों में एक क्षण को
आश्चर्य ठहरा रहा —
मुक्ति शायद जलने में नहीं,
संयम में है।

महेंद्र 'मजबूर'

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

सुदामा : एक मनुष्य की भूख

मैं, सुदामा —

एक छोटा-सा नाम,
इतिहास के किनारे पड़ा हुआ
अधूरा प्रसंग।

कभी मित्र था मैं कृष्ण का —
वो नंददुलारे,
जो अब द्वारका का स्वामी है,
और मैं —
अपने ही बच्चों की भूख में
भाषा खो चुका एक पिता।

पत्नी की आँखों में
सिर्फ़ जल नहीं था,
वो प्रश्न था —
कि प्रेम से पेट भरता है क्या?

मैंने उत्तर नहीं दिया,
क्योंकि मेरे शब्दों की
रोटी नहीं बनती।

घर की दीवारों से झाँकते थे
कृष्ण के बचपन के स्वर,
गोपीजन की हँसी,
और मेरे भीतर
भूख का एक विशाल समुद्र।

मैं चल पड़ा —
काँपते पैरों के साथ,
एक पोटली में चावल नहीं,
अपना आत्मसम्मान बाँधकर।

द्वारका चमक रही थी,
मैं धूल में लिपटा,
राजमहल के सामने
जैसे अपनी छाया को खोज रहा था।

कृष्ण दौड़े —
कहा, “मित्र!”
पर उस शब्द के भीतर
राजसी गूँज थी।

मैं मुस्कुराया,
सोचा —
क्या इस दरबार में
मित्रता भी वस्त्र पहनती है?

उसने पोटली खोली —
कुछ दाने,
जिनमें मेरी भूख की पूरी कहानी थी।
वो बोला, “मित्र, यह तो अमूल्य है।”

और मैं सोचता रहा —
क्या भूख भी
कभी मूल्यवान हो सकती है?

मित्रता,
भक्ति,
दया —
सब उस क्षण में
इतने चमकदार हो गए,
कि मेरी सच्चाई ओझल हो गई।

मैं लौट आया,
पर रास्ते में
मैंने देखा —
मेरे घर के द्वार पर
अब भी वही प्रश्न खड़ा था —
“प्रेम से पेट भरता है क्या?”

✍️ महेंद्र मजबूर ©️®️

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ

धुंधली सी स्मृति में झिलमिल रेखा —

स्वप्नों के वन में वह एक देखा।

तुम चल दिए जब नभ के पार,

छूट गया मेरा संपूर्ण संसार।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

अश्रु न थे — बस धुंधलका था,

शब्द न थे — केवल कंपन था।

मन की वीणा टूटी सी पड़ी,

सुर तुम थे, मैं केवल लड़ी।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

तुम गए जहाँ, वहाँ आलोक,

मैं रह गई छाया की शोक।

प्रेम था तुममें — था मुझमें भी,

फिर यह विभाजन क्यों जीवन में ही?

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

साँसों में अब भी वह गंध बसी,

जिससे तुम्हारी राह हँसी।

पर अब वह पथ मौन पड़ा,

ज्यों दीपक बिन तेल झड़ा।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

तुम्हारा वन, मेरा एकांत,

दोनों एक ही तप का प्रांत।

तुम धर्म थे, मैं प्रेम रही,

दो धाराएँ, एक से बही।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

अब जब भी चाँदनी झरती है,

मन की वीणा फिर भरती है।

छू जाती हूँ तुम्हारा नाम,

वह बन जाता है ध्यान, प्रणाम।

नाथ, मुझे क्यों न ले गए साथ...

✍#महेंद्र मजबूर ©️®️

अक्तूबर का एकांत


अक्तूबर उतर आया है —
धीरे, बिना शोर।
हवा में ठंड है,
पर मन में उससे गहरी सिहरन।

छत से गिरती हर बूँद
जैसे समय का प्रश्न है —
कब तक?
कहाँ तक?
किस ओर?

कमरे की दीवारें —
अब सिर्फ ईंट नहीं,
मेरे भीतर की थकान का चेहरा हैं।

कभी लगता है,
मैं अपने ही जीवन का किनारा हूँ —
जहाँ लहरें आती हैं,
पर ठहरती नहीं।

बच्चों की आँखों में
एक नन्हा विश्वास झिलमिलाता है,
पत्नी की दृष्टि में
निःशब्द प्रश्न —
“अब क्या होगा?”

और मैं...
इतना थक चुका हूँ
कि अपने ही उत्तर से डर लगता है।

सपनों की राख में
अब भी कोई अंगारा बचा है —
पर क्या वह जल पाएगा
इस अनिश्चित हवा में?

बाहर वर्षा गिर रही है —
पर भीतर
सिर्फ मैं हूँ,
भीगा हुआ,
बिना किसी छतरी के।

कभी-कभी सोचता हूँ —
क्या यही जीवन है?
या यह किसी और जीवन की प्रतीक्षा है
जो अभी तक जन्म नहीं लिया।

और तभी,
कहीं बहुत भीतर
एक धीमी आवाज़ आती है —
“चलो,
बस एक साँस और,
शायद वहीं से
नया आरंभ शुरू हो।”


✍महेंद्र 'मजबूर' ©️®️