✍️ रचनाकार: महेंद्र मजबूर
(1)
जग भ्रम में सब जी रहे, बोले “मेरा-तेरा”,
साँच कहे महेंद्र यह, कुछ भी नाहीं तेरा॥
(2)
माटी के घर में बसत, माटी तन का रूप,
आया खाली हाथ तू, जाएगा भी धूप॥
(3)
दिन दो पल का मेला यह, सबकी अपनी चाल,
कागज जैसे उड़ चले, टूटे हर जंजाल॥
(4)
माया के बंधन में जग, सब उलझा मुस्काय,
देख सच्चा जो रूप जब, मन भीतर हरषाय॥
(5)
धन दौलत कुल जात सब, सपनों के ही छंद,
जागे जो यह जान ले, सच्चा वही प्रचंड॥
(6)
ना राजा तू, ना भिखारी, ना तेरा पहचान,
बस एक यात्री मनुज है, चलता प्रभु के धाम॥
(7)
मन का मोह ही जाल है, इसमें जग उलझाय,
छोड़ अभिमान मोह सब, सच्चा सुख मिल जाय॥
(8)
साँस-साँस हरि नाम ले, मन से कर अरदास,
क्षण में यह जीवन ढले, जैसे जल की आस॥
(9)
लोभ, क्रोध तृष्णा त्यज, मत कर मन को भर,
जो भीतर दीपक जले, वही सच्चा सुंदर॥
(10)
सत्य प्रेम करुणा धर, त्यज दे अभिमान,
यही है जीवन सार तू, यही प्रभु का ज्ञान॥
(11)
जग में आया खेल कर, मत भूल प्रभु नाम,
महेंद्र कहे यही सिखा — सबमें एक ही राम॥