सोमवार, 10 नवंबर 2025

वो एक अधूरा गाना

वो एक अधूरा गाना

छूट गया कहीं वो पल सुहाना,
भुला दिया जो एक अफसाना,
पर दिल की गहराई में अब भी,
गूँज रहा है उसका तराना।
कोई खामोशी है भीतर बसी,
जो बोल नहीं, बस सुनती है,
हर सांस में उसकी हल्की-सी खुशबू,
अब भी धीमे से छनती है।
मैं धुन गुनगुनाता रहा उम्र भर,
वो गीत रहा अधूरा मगर,
हर सुर में उसकी याद मिली,
हर शब्द में उसका असर।
कहना चाहा कई दफ़ा,
पर लफ़्ज़ कहीं रुक जाते हैं,
कुछ एहसास बस जीए जाते हैं,
कभी ज़ुबां तक नहीं आते हैं।
अब जब भी रात उतरती है,
सन्नाटा गाता है वो गाना,
जो पूरा कभी न हो सका,
फिर भी दिल में है वो अफसाना।

#महेंद्र "मजबूर"

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

 

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

बाबा...
क्या मैं पराई हूँ...?
जब मैं पहली बार हँसी थी,
आपकी आँखों में जो चमक थी...
वो क्या कुछ बरसों की ही थी...?

जब आप मुझे कंधों पर बिठाकर कहते थे —
“मेरी गुड़िया, मेरी राजकुमारी...”
क्या उस राजकुमारी का राज
किसी और के घर में था, बाबा...?

जब मैं स्कूल से दौड़ती हुई आती थी,
आप कहते थे — "धीरे भाग बेटी!"
क्या उस वक़्त भी आप जानते थे
कि एक दिन मैं सच में... दूर चली जाऊँगी...?

बाबा...
जब मैं साड़ी पहनूँगी पहली बार,
आप नज़रें झुका लेंगे...?
या पलटकर देखेंगे भी नहीं...?

जब मैं विदा लूँगी...
क्या मेरे आँसुओं को
आप अपनी हथेलियों में समेट लेंगे,
या बस हवा में छोड़ देंगे...?
बाबा...
माँ कहती है, “लड़की का घर तो ससुराल होता है।”
तो ये घर क्या है, बाबा...?
जहाँ दीवारों पर मेरी हँसी है,
जहाँ मेरे पैरों की आहटें गूँजती हैं —
क्या ये सब मिट जाएगा...?

क्या मैं मिट जाऊँगी...?
जब कोई और कमरे में सोएगा,
जहाँ मैं गुड़ियों से बातें करती थी...
क्या वो गुड़िया भी चुप हो जाएँगी...?
बाबा...
क्या आप मेरे बाद कमरे का दरवाज़ा बंद कर देंगे...?
या रोज़ चुपचाप खोलेंगे,
बस यह देखने कि मैं लौट आई क्या...?

जब मैं किसी और घर में “बहू” बनूँगी,
किसी के लिए “माँ” बनूँगी...
तो मेरे भीतर जो “आपकी बेटी” है —
वो कहाँ जाएगी...?
कौन पुकारेगा मुझे वैसे —
“अरे बिटिया... आज फिर बाल उलझे हैं!”

बाबा...
क्या मैं सच में पराई हूँ...?
या ये दुनिया झूठ बोलती है...?
क्यों हर आँगन मुझे अपनाने से पहले
छोड़ने की तैयारी करता है...?

बाबा...
अगर सच में मैं पराई हूँ —
तो मेरा मन इतना अपनों सा क्यों धड़कता है...?
क्यों हर दर्द में आपका नाम निकलता है...?
बस एक बार...
बस एक बार कह दो बाबा —
कि मैं तुम्हारी थी...
तुम्हारी हूँ...
और तुम्हारी ही रहूँगी...

फिर चाहे यह दुनिया हज़ार बार कहे —
“लड़की तो पराई होती है...”

-महेंद्र "मजबूर "©️®️

विरह में जल की छाया

 

विरह में जल की छाया

आँखें —
जैसे किसी अनकहे क्षण का ठहरा हुआ जल।
कठोर?
शायद…
जैसे पत्थर में सोई हुई नमी।

श्मशान लौटकर
वे कुछ नहीं कहतीं —
बस राख की गंध
थोड़ी देर तक
मन के भीतर टिमटिमाती रहती है।

फिर सब शान्त।
जैसे मृत्यु भी थक गई हो।

पर जब
किसी भूले हुए स्पर्श की आहट
धीरे से छू जाती है —
तो भीतर कुछ रिसता है,
कोई शब्दहीन रोशनी
बह निकलती है —
धीरे…
बिलकुल वैसे,
जैसे बर्फ पिघलने पर
पानी भी रो नहीं पाता।

श्मशान की निष्ठुरता से नहीं,
प्रेम की अनुपस्थिति से टूटती हैं ये आँखें —
और फिर भी
वो टूटना ही शायद
उनका जीवित रहना है।

-महेंद्र "मजबूर"

माधव के बिना

 

माधव के बिना


अब भी गूंजता है रण का शंख,
पर उसमें कोई आस्था नहीं है।
धूल में लिपटे हुए रथों पर
कर्म का नहीं, केवल अहंकार का भार है।
और जहाँ माधव नहीं —
वहाँ समय भी रुक जाता है,
इतिहास भी मौन हो जाता है।

कर्ण!
तेरा दान व्यर्थ गया,
तेरी करुणा भी तेरे रथ के पहिए संग टूट गई।
द्रोण!
तेरा शिष्य तेरा संकल्प निगल गया,
ज्ञान की दीपशिखा लहू में बुझ गई।
दुर्योधन!
तेरा साम्राज्य तेरे ही क्रोध में डूब गया,
तेरा स्वप्न तेरे अहं से बड़ा था क्या?

क्योंकि जहाँ माधव नहीं,
वहाँ विजय का अर्थ नहीं होता।
वहाँ केवल एक निःशब्द पराजय होती है—
जिसे समय बार-बार दोहराता है।

और अर्जुन...
वह तो केवल एक निमित्त है,
जिसकी डोर माधव के हाथों में है।
उसकी आँखों में जो आँसू हैं,
वही सत्य हैं —
क्योंकि उनमें करुणा है, और करुणा ही धर्म है।

युद्ध समाप्त नहीं होता,
हर युग में जन्म लेता है।
हर मनुष्य के भीतर
एक कुरुक्षेत्र फिर से सजता है।
और हर बार—
जिनके हिस्से में माधव नहीं होते,
वे सब... हार जाते हैं।

-महेंद्र "मजबूर"

मौसमों के उस पार

 मौसमों के उस पार 


सुनो,

मैं नवंबर की गुनगुनी ठंड ले आया हूँ —

वह ठंड,

जो तुम्हारे शब्दों की तरह चुभती नहीं,

बस चुपचाप भीतर उतर जाती है।

मेरे हाथों में अभी भी धूप की आख़िरी गरमी है,

जो तुम्हारे नाम से पिघलती है,

और हर साँझ मुझसे पूछती है —

क्या वह आएगी?

तुम आना,

दिसंबर की लंबी रातों को साथ लेकर —

जहाँ तारे देर तक जागते हैं,

और मौन में भी कोई संगीत सुनाई देता है।

अपने संग लाना —

थोड़ी-सी गुलाबी धूप,

थोड़ी-सी उनींदी नींद,

और वो अधूरी मुस्कान

जो पिछली सर्दी में दरवाज़े पर रह गई थी।

क्योंकि देखो —

मौसम केवल बाहर नहीं बदलते,

वे भीतर भी उतरते हैं।

हर ठंड का एक स्पर्श होता है,

हर धूप का एक नाम।

मैं नवंबर हूँ —

क्षणिक, कोमल,

थोड़ी धूप, थोड़ी धुंध,

और बहुत-सी प्रतीक्षा लेकर।

और तुम दिसंबर हो —

गहरा, दीर्घ,

जिसकी रातें ठंड में भी तपती हैं

क्योंकि उनमें प्रेम जीवित है।

जब हम मिलेंगे —

तो शायद ऋतु नहीं,

समय रुक जाएगा;

धूप और ठंड एक हो जाएँगे,

जैसे प्रेम और विरह

एक ही साँस में जीते हों।


-महेंद्र मजबूर

रविवार, 9 नवंबर 2025

मुस्कान के पीछे का सन्नाटा

 

मुस्कान के पीछे का सन्नाटा

मेरी वेदनाएं सीमित हैं, मेरे अंतर्मन की दीवारों में,
जहाँ शब्द भी थक जाते हैं, आँसू छिप जाते हैं धारों में।

दुनिया तो बस चेहरा देखती है, हँसी में अर्थ तलाशती है,
पर दिल की दरारों की आवाज़ — किसे सुनाई पड़ती है?

हर सुबह मैं एक नया मुखौटा पहनता हूँ,
खुशी का रंग भरकर जीवन का अभिनय करता हूँ।

क्योंकि शिकवे दुनिया को समझ नहीं आते,
और दर्द यहाँ कमजोरी कहलाते हैं।

पर भीतर का तूफ़ान अब भी जागता है,
हर मुस्कान के पीछे एक सन्नाटा भागता है।

कभी सोचा है — ये चमकती आँखें क्यों नम हैं?
क्योंकि जो दिखता नहीं, वही सबसे गहरा ग़म है।

महेंद्र मजबूर 

मीरा की अंतिम पुकार

 "मीरा की अंतिम पुकार"


देखो ना माधव,

यह तेरी बनाई हुई दुनिया

अब मेरा इम्तिहान लेना चाहती है।

हर कोई कहता है —

तेरा नाम भूल जा,

पर यह नाम ही तो मेरी साँसों का अर्थ है।


माधव,


जो मेरे अपने हैं,

वही अब मुझसे डरते हैं —

कहते हैं, मीरा पागल हो गई है,

क्योंकि वह तुझसे प्रेम करती है

बिना भय, बिना संकोच।


राणा जी आए हैं — माधव... 


संग लाए हैं मेरे लिए जहर का प्याला।

कहते हैं,

अब तेरी भक्ति बस बहुत हुई।

पर मैं मुस्कुरा रही हूँ, माधव —

क्योंकि यह प्याला भी तो

तेरे नाम का प्रसाद है।

माधव,

उसमें भी

तेरा ही प्रतिबिंब झलकता है।

जहर?

नहीं…

यह तेरे मिलने की सीढ़ी है।

माधव,

मैं खुशी से पी लूंगी —

शायद मौत के बाद

तेरी बाँसुरी की ध्वनि सुनाई दे,

और मैं उसमें खो जाऊँ,

हमेशा के लिए। 


माधव…

क्या मैं तेरे लिए राधा जैसी प्रिय नहीं?


क्या मेरी भक्ति कम थी,

या मेरा प्रेम अधूरा था?


कब तक मेरी परीक्षा लोगे माधव?


कब तक मेरा हृदय राख बनता रहेगा

तेरे नाम के ताप में?


अब ये महल मुझे कैद लगते हैं,

हर दीवार जैसे फुसफुसाती है —


“मीरा, तू पागल है।”


हाँ माधव,

मैं पागल हूँ —

पर तेरे प्रेम में।

चित्तौड़गढ़ अब मुझे अच्छा नहीं लगता।

यहाँ की हवा भी

तेरे बिना भारी लगती है।

बताओ ना माधव,

मैं कहाँ जाऊँ?


कौन-सा वन है

जहाँ तेरे चरणों की धूल मिले?


माधव, सुनो…

यदि आज मैं यह विष पी लूँ,

तो समझना —

मीरा हार नहीं रही,

मीरा लौट रही है —

तेरे पास,

तेरे स्वर में,

तेरे मौन में। 


माधव…

अब मीरा नहीं बोलेगी,

अब बंसी बोलेगी —

और तेरे स्वर में

उसकी आत्मा गूँजेगी। 


("माधव का उत्तर : मीरा को")


मीरा...

अब प्याला तेरे हाथ में है,

पर जहर नहीं है उसमें —

वह तो मेरे मिलने की लहर है।


जिसे यह संसार “मृत्यु” कहता है,

वह तेरे लिए —

बस एक द्वार है,

जिसके उस पार मैं खड़ा हूँ,

मुस्कुराता हुआ।


मीरा,

तू पूछती थी —

“क्या मैं राधा जैसी प्रिय नहीं?”


राधा का प्रेम संध्या का गीत था,

तेरा प्रेम — भोर की ज्योति है।


राधा ने प्रेम किया,


पर तूने प्रेम को पूजा बना दिया।


तूने मुझे माँगा नहीं,

स्वयं को दे दिया।

मीरा,

तेरी हर पीड़ा

तेरे भीतर की ज्योति बन गई है।

यह जो लोग कहते हैं — तू पागल है,

उन्हें क्या पता,

जो प्रेम में डूबता है,

वह संसार के लिए खो जाता है,

पर सत्य में मिल जाता है।

मैं तेरे महलों की दीवारों में नहीं,

तेरे अंतर्मन की निस्तब्धता में हूँ।

जब तू जहर पीती है,

तब मैं तेरी नसों में बहता हूँ —

अमृत बनकर,

मुक्ति बनकर।

मीरा,

अब चित्तौड़ छोड़ दे,

यह किला नहीं, एक छाया है।

तेरा घर वहाँ है,

जहाँ कोई दीवार नहीं,

जहाँ तेरी प्रार्थना ही हवा है,

और मैं — तेरी हर साँस में।

मत रो मीरा…

तेरी हँसी में अब प्रकाश है।

अब तू शरीर नहीं,

संगीत है।

तेरी देह मिटेगी,

पर तेरी भक्ति —

युगों तक गूँजेगी। 


मीरा,

तू विष नहीं पी रही,

तू समय को पी रही है —

और इस क्षण से

तेरा नाम

मेरे नाम में विलीन हो गया है।


अब तू मैं हूँ,


और मैं —


तू। 


-महेंद्र 'मजबूर'©️®️