शनिवार, 29 नवंबर 2025

आग का यात्री

 

आग का यात्री

मैंने बचपन खो दिया था—
किसी अदृश्य उद्घोष की तरह,
जहाँ मासूमियत का स्वर
समय की फटी किताबों में दबा पड़ा था।

फिर मैं गिरा—
मनुष्य की उस खोह में,
जहाँ छल है, धोखा है, पाखंड है,
और हर चेहरा एक मुखौटा,
हर हाथ पर झूठ की परतें।

यह जीवन नहीं—
एक भट्टी है,
जहाँ मैं स्वर्ण नहीं,
बल्कि आग में उलझा हुआ प्रश्न हूँ।

धधकता हुआ अहंकार—
कभी मुझे जला देता है,
कभी मुझे बुझा देता है,
पर मैं न पूर्ण राख हूँ
न पूर्ण ज्योति।

मैं धुआँ हूँ—
त्रिशंकु-सा लटका,
अधूरी मृत्यु के अँधेरे में।

क्योंकि ज्ञान एक ऐसा दंश है
जो लौटने नहीं देता,
अनुभव एक ऐसा सत्य
जो भुलाया नहीं जा सकता।

मैं समय के विरुद्ध नहीं,
पर उसके भीतर जूझ रहा हूँ—
उस नदी में जहाँ लौटना वर्जित है,
और आगे बढ़ना अनिवार्य।

हाँ, सोना निखरता है आग में,
पर हमेशा जलता रहे—
यह भी एक कैद है!

इसलिए मैं संघर्ष करता हूँ—
अपने भीतर के मनुष्य से,
अपनी ही राख से,
अपने ही अंधकार से।

एक दिन
यह आग मुझे मुक्त करेगी—
या तो मैं जलकर समाप्त हो जाऊँगा,
या स्वर्ण की अंतिम चमक में
अपने भीतर का सत्य पा लूँगा।

-महेंद्र 'मजबूर'

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अधूरी ज़िंदगी

 अधूरी ज़िंदगी 

ज़िंदगी, तू सच में हसीं है,
फूलों की महक, हवा की सरसराहट — सब तेरी है।
फिर भी…
जब वह पास नहीं,
तू अधूरी सी लगती है।

हर सुबह में तेरी रौशनी है,
हर शाम में तेरे रंग हैं,
फिर भी…
उसकी यादों के बिना,
तेरी खुशियाँ भी कुछ फीकी सी हैं।

मैं चलता हूँ तेरे रास्तों पर,
साँसें भरता हूँ तेरी हवा में,
फिर भी…
उसके बिना, मेरी ज़िंदगी
जैसे अधूरी कहानी सी है।

तेरी हँसी भी अधूरी है,
तेरी ख़ुशियाँ भी अधूरी हैं,
और मैं…
बस उसका इंतजार करता हूँ,
कि लौट आए, और तू पूरी सी लगे।

-महेंद्र 'मजबूर'

बाकी तो नहीं

मेरे दिल में तेरी यादों का कोई असर बचा बाकी तो नहीं,

तेरी मोहब्बत की राख में कोई चिन्ह जगा बाकी तो नहीं।

तेरे जाने से टूटी हर आस, हर ख्वाब अधूरा रहा,
इन ख़ामोशियों में कोई पुरानी दुआ बाकी तो नहीं।

तेरी आँखों की गहराई में मेरी साँसें खो गईं,
इस वीराने में कोई तेरी याद बसा बाकी तो नहीं।

हर दर्द मैंने अपने भीतर सहा और संभाला है,
इन अश्क़ों में कोई राहत छुपा बाकी तो नहीं।

तेरी हँसी की हल्की आहट आज भी दिल को छूती है,
इन पलकों में कोई रोशनी जगा बाकी तो नहीं।

हमने जो वादे कभी निभाने की ठानी थी,
इन फासलों में कोई निशां बचा बाकी तो नहीं।

आख़िरी बार पूछ लें दिल से ये सवाल,
तेरे बिना हमारे बीच मोहब्बत बचा बाकी तो नहीं।

तुम्हारे लौटने की राह अब भी वीरान है,
इन रास्तों में कोई ठंडी छाँव जगा बाकी तो नहीं।

जो खोया, उसे यादों में सावधानी से रखा है,
इन लम्हों में कोई ख़ुशी बसी बाकी तो नहीं।

तेरे बिना यह जीवन आधा और सुनसान लगता है,
इस दुनिया में कोई साया, कोई हमसफ़र बाकी तो नहीं।

यादों का सिलसिला अब भी धीरे चलता है,
इन रातों में कोई चिंगारी जगा बाकी तो नहीं।

मेरी तन्हाई अब सिर्फ़ तेरे नाम की गवाही देती है,
इन दीवारों में कोई आवाज़ बाकी तो नहीं।

तूने जो छोड़ दिया, वह दर्द अब तक मेरे साथ है,
इस बिखरे दिल में कोई राहत बची बाकी तो नहीं।

हर साँस में तेरी कमी गहरी तरह महसूस होती है,
इस जीवन में कोई राहत जगा बाकी तो नहीं।

और जब चाँद भी तन्हा आसमान में झिलमिलाता है,
इस दिल की खामोशी में कोई रोशनी बाकी तो नहीं।

महेंद्र "मजबूर"©️®️

प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

 प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

मेरे हृदय की अक्षरित संवेदना का
तुम ही परम-उद्गम हो,
अधरों पर ठिठकी व्याख्याओं की
अनुत्तरित प्रतिध्वनि हो तुम।

तुम ही समय की अनंत धारा में
अस्तित्व का शाश्वत अनुलेपन,
धड़कनों के अंतरालों में
प्रेम का पवित्रतम संलेपन।

तुम ही मौन की मर्मज्ञ व्याख्या,
निशब्दताओं का गहन शब्दार्थ,
तुम ही अंतरतम की वेदना में
स्पंदित सौंदर्य का अंतिम अर्थ।

जैसे नयनों में जमता रहा
भावों का अतल-संलयन,
तुम हो मेरे समस्त अनुभूतियों का
एकमात्र सूक्ष्म-संवेदन।

मेरे हृदय में परिभाषित प्रेम की
अदृश्य, अविनश्वर संरचना हो तुम—
तुम ही ध्येय, तुम ही सार,
प्रेम का दार्शनिक अनुवाद भी तुम। 

महेंद्र "मजबूर"©️®️

सोमवार, 10 नवंबर 2025

कागज़ की नाव

 

कागज़ की नाव 

हम सपनों में रचते रहे, कागज़ की वह नाव,
नदियों में खोजते रहे, जीवन का प्रवाह।

बचपन की धूप थी सरल, छांव में थी माया,
हर लहर में दिखती थी, जग की मीठी छाया।

पर जब प्रौढ़ता आई, बढ़ी लहरों की धुन,
भंवरों ने तोड़ दिए, वो नन्हे स्वप्न गुन।

मन के तट पर आज भी, बचपन का वह भाव,
कभी भिगो दे आँख को, कभी करे विलाप।

सीखा तब हमने यही — यही जग का मर्म,
निर्मल हृदय के गीतों में, छिपे जीवन के कर्म।

फिर भी भीतर कहीं वही, नन्ही नाव तिरती,
भंवरों से लड़ती हुई, मुस्कान लिए गिरती।

महेंद्र मजबूर 

नदी का तीर

 

नदी का तीर 

अब भी भाता है मुझे, वही नदी का तीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

नीरव था वन, झुकीं तरुवर की कोमल डालें,
लहरों में झलके थे नभ के सपनों के जाले।
मृदु पवन बही थी जैसे किसी का आह्वान,
और धरा ने ओढ़ लिया था संध्या का मान।

उस क्षण की हल्की मुस्कान, अधरों की लोरी,
बन गई हृदय में गूंजती, एक मधुर सिंधु-गोरी।
वह प्रथम वेदना, जो प्रेम से पहले आई,
आज भी स्मृति में वही दीपिका बन छाई।

समय की धारा बह गई, सब कुछ ले डोली,
पर मन के घाट न सूखे, वे पीड़ा की बोली।
अब भी जब संध्या ढले, सुनूं वही नीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

महेंद्र मजबूर 

तुम बनो प्रभात

 तुम बनो प्रभात


जब मन में छाए घने अंधियार,

टूटे सपनों का हो संसार,

तब तुम आना, बन किरण उजाल,

मन को देना नया खयाल।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब थम जाए जीवन की राह,

ना हो कोई अपना अथवा चाह,

तब तुम बन जाना मुस्कान,

भर देना फिर से अरमान।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब हर दिशा मौन हो जाए,

दिल में बस सन्नाटा छाए,

तब तुम गुनगुनाना धीरे,

सपनों को जगाना पीरे।।


तुम बनो प्रभात, अमर उजियारा,

जीवन हो फिर से प्यारा।

तुम बनो प्रभात…

तुम बनो प्रभात… 


 #महेंद्र मजबूर ©️®️